विस्तृत उत्तर
संगीत और ध्यान का संबंध 'नाद योग' परंपरा में विस्तार से वर्णित है।
दो मत
पक्ष में (नाद योग दृष्टि)
हठयोग प्रदीपिका (4.65): 'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति।' — नाद (ध्वनि) ब्रह्म में निपुण व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त होता है।
नाद बिंदु उपनिषद: नाद-ध्यान से चित्त की एकाग्रता होती है। शुद्ध संगीत — राग-आधारित, शांत, सात्विक — ध्यान का प्रवेश द्वार बन सकता है।
विपक्ष में (निर्गुण ध्यान दृष्टि)
पतञ्जलि योगसूत्र: गहरे ध्यान में सभी बाहरी उत्तेजनाएँ बाधक हैं। संगीत मन को रूप-रंग-भाव की ओर खींचता है, जो गहरे ध्यान में बाधा है।
निष्कर्ष
- ▸प्रारंभिक साधक: शांत, सात्विक भजन या ॐकार सहायक
- ▸नाद योगी: ध्यान का प्रवेश द्वार
- ▸उन्नत साधक: मौन ध्यान ही उचित
वर्जित संगीत: उत्तेजक, राजसिक, तामसिक संगीत ध्यान के विरुद्ध।




