विस्तृत उत्तर
ध्यान से जीवन-संतुलन का संबंध 'समभाव' की प्राप्ति से है।
भगवद्गीता (6.33): 'समत्वं योग उच्यते।' — समभाव (सुख-दुःख में समान रहना) ही योग है। ध्यान इस समभाव को विकसित करता है।
संतुलन की पाँच भूमियाँ
1भावनात्मक संतुलन
ध्यान से 'पर्यवेक्षक' (observer) का विकास होता है — व्यक्ति भावनाओं में बहता नहीं, उन्हें देखता है।
2मानसिक संतुलन
पतञ्जलि: नित्य ध्यान से चित्त की चंचलता कम → निर्णय-शक्ति बेहतर → जीवन-निर्णय संतुलित।
3स्वास्थ्य संतुलन
श्वास-नियंत्रण से तंत्रिका-तंत्र शांत → रोग-प्रतिरोधक क्षमता बेहतर → शारीरिक संतुलन।
4सामाजिक संतुलन
ध्यानी का अहंकार कम → संबंधों में समता → परिवार और कार्यक्षेत्र में संतुलन।
5आत्मिक संतुलन
अष्टावक्र गीता (1.11): जो आत्म-बोध में स्थित है, वह सुख-दुःख, लाभ-हानि में समान रहता है।
भगवद्गीता (6.7): 'जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।' — जिसने मन को जीत लिया, उसके लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख सब समान हैं।





