श्रीविष्णुपुराणम्: प्रथमोंऽशः, अष्टमोऽध्यायः – रौद्र–सृष्टि का विस्तार और भगवान् तथा लक्ष्मीजी की सर्वव्यापकता
खंड प्रथम: रौद्र सृष्टि का क्रमबद्ध विस्तार
मंगलाचरण एवं विषय प्रवेश
महर्षि पराशर और मैत्रेय के संवाद की परमार्थिक भूमिका
अत्यंत पावन एवं परमार्थिक भाव से परिपूर्ण, यह अष्टम अध्याय महर्षि पराशर द्वारा अपने परम शिष्य मैत्रेय के समक्ष सृष्टि के जटिल क्रम को उद्घाटित करता है। यह वर्णन पूर्व अध्यायों में स्थापित सनातन सिद्धांतों का ही विस्तार है, जहाँ मैत्रेय जी ने सृष्टि के उपादान कारण, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कर्ता के विषय में जिज्ञासा प्रकट की थी।
महर्षि पराशर ने पूर्व में ही यह गहन सत्य स्थापित कर दिया है कि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सर्वव्यापक, निर्विकार, शुद्ध, और अविनाशी परमात्मा श्री विष्णु से ही उत्पन्न हुआ है। समस्त व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि उन्हीं में स्थित है, वे ही इस जगत् के नियन्ता, कर्ता, धर्ता और लयकर्ता हैं । यह जगत् उन्हीं का स्वरूप है—"स्थितिसंमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः"।
यह दार्शनिक आधार सर्वोपरि है कि सृष्टि, स्थिति (पालन), और संहार (विलय) का त्रिविध कार्य ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में व्यक्त होता है। तथापि, ये तीनों रूप मात्र कार्य-कारण के भेद से भिन्न प्रतीत होते हैं, जबकि परमार्थतः वे एक ही परब्रह्म श्री विष्णु की त्रिगुणात्मक भूमिकाएँ हैं । पालन के रूप में वे विष्णु हैं, सर्ग (सृष्टि) के रूप में ब्रह्मा हैं, और विलय (संहार) के रूप में वे रुद्र-शिव हैं। अष्टम अध्याय की रौद्र सृष्टि की कथा इसी परम सत्य को विष्णु के नियंत्रक स्वरूप में स्थापित करती है।
रौद्र सृष्टि के वर्णन का आरम्भिक प्रयोजन
यह अध्याय सर्ग (सृष्टि) के क्रम को आगे बढ़ाता है। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना का संकल्प लिया, तो उन्होंने सर्वप्रथम चार मानस पुत्रों (सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार) को उत्पन्न किया। परन्तु ये महात्मा वैराग्य और योग मार्ग में रत रहने के कारण संसार रचना की कामना से विरत हो गए, जिससे सृष्टि वृद्धि का कार्य अवरुद्ध हो गया।
सृष्टि की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए ब्रह्मा जी को एक ऐसी ऊर्जा का प्राकट्य करना पड़ा जो न केवल गति लाए, बल्कि संहार और परिवर्तन (नियमन) भी कर सके। इसी आवश्यकता के कारण रुद्र की उत्पत्ति हुई। रुद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के 'अहंकार' से नहीं, अपितु सृष्टि के प्रारंभिक क्रम में उत्पन्न हुई 'बाधा' और 'दुःख' (क्रोध और खेद) से जुड़ी है, इसीलिए इसे रौद्र (भयंकर) सृष्टि कहा गया है। रौद्र सृष्टि का उद्देश्य जगत की अशुद्धियों को हरना और सृष्टि के प्रवाह को बनाए रखना है।
ब्रह्मा जी का रोदन एवं रुद्र का प्राकट्य
सृष्टि रचना में आई बाधा और ब्रह्मा जी का मानस दुःख (क्रोध)
जब ब्रह्मा जी ने देखा कि उनके मानस पुत्रों—जो सात्त्विक और योगी थे—ने सृष्टि कार्य में सहयोग नहीं किया, तो उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की, परन्तु जब कोई काम नहीं बना, तब उनके मन में तीव्र खेद और निराशा की भावना ने जन्म लिया। यह तीव्र मानस दुःख ही क्रोध (मैन्यु) के रूप में प्रकट हुआ। सृष्टिकर्ता के लिए अपनी ही रचना का अवरुद्ध हो जाना अत्यंत कष्टदायक था, और इसी क्रोध की अभिव्यक्ति ने रौद्र स्वरूप को जन्म दिया।
२ ‘रुद्र’ नाम की व्युत्पत्ति: रोदन (रोना) और रौद्रता का निहितार्थ
जब ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोध से आविष्ट हुए, तो उनके ललाट (भृकुटि) से एक परम तेजस्वी, किन्तु भयंकर, बालक तत्काल प्रकट हुआ। यह बालक अग्नि के समान प्रज्वलित था और उसका स्वरूप अत्यंत क्रूर (उग्र) दिखाई दे रहा था। वह जन्म लेते ही अत्यंत उच्च स्वर में रोने लगा (रोदन करने लगा)।
ब्रह्मा जी ने उस बालक से रोने का कारण पूछा। बालक ने रोदन करते हुए कहा कि उसका कोई नाम और स्थान निश्चित नहीं है। तब, चूंकि वह बालक रो रहा था, इसलिए ब्रह्मा जी ने उनका नाम 'रुद्र' रखा। 'रुद्र' शब्द की व्युत्पत्ति 'रुद' (रोना, रुलाना, दुःखों को हरना) धातु से हुई है।
आध्यात्मिक विश्लेषण: 'रुद्र' नाम केवल बालक के रोने के कारण नहीं पड़ा, अपितु यह सृष्टिक्रम में एक गहन दार्शनिक आवश्यकता को दर्शाता है। रोदन (रुदिर) सृष्टि के क्लेश, दुःख और पीड़ा को दर्शाता है। परम शक्ति (विष्णु) के अंशावतार रुद्र का प्राकट्य इसलिए हुआ, ताकि वे सृष्टि के दुःखों को हरने वाले (शिव) और साथ ही, कर्मों के फल स्वरूप जीवों को रुलाने वाले (संहारकर्ता) बन सकें।
रुद्र का यह भयंकर स्वरूप सृष्टि के मंगल (शिवत्व) के लिए आवश्यक था। यदि संसार में केवल निर्माण होता रहे और पुरानी, अशुद्ध, एवं तामसी रचनाओं का संहार न हो, तो नई और सात्त्विक सृष्टि का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। इस प्रकार, रौद्रता (विनाश की शक्ति) वास्तव में शुद्धि और कल्याण (मंगल) की पूर्व शर्त है।
रुद्र का स्वरूप: अर्धनारीश्वर विग्रह का प्राकट्य
विष्णु पुराण में वर्णित है कि क्रुद्ध ब्रह्मा के मुख से जो रुद्र प्रकट हुए, उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और भयंकर (उग्र) था। यह भी वर्णित है कि यह रुद्र अपनी मूल उत्पत्ति में अर्धनारीश्वर विग्रह में प्रकट हुए थे। इस स्वरूप का अर्थ यह है कि रुद्र आदि काल से ही पुरुष (चेतना) और शक्ति (प्रकृति) के सनातन सिद्धान्त को धारण करते हैं। वे शक्तिमान (पुरुष) भी हैं और स्वयं शक्ति (प्रकृति/स्त्री) भी हैं।
सृष्टिगत संकट एवं समाधान की आवश्यकता: जब रुद्र ने अपनी रौद्र शक्ति के साथ सृष्टि का आरंभ किया, तो उनकी संतानें भी रुद्र के समान ही भयंकर और प्रलयकारी थीं। उनकी प्रजा मृत्यु, रोग, और विनाश की प्रवृत्ति से युक्त थी, जिसके परिणामस्वरूप वे सृजन से अधिक संहार करने लगे। सृष्टि का पालन और स्थायित्व खतरे में पड़ गया। यह देखकर ब्रह्मा जी चिंतित हुए, क्योंकि इस प्रकार की उग्र सृष्टि जगत् के स्थायी निवास के लिए अनुकूल नहीं थी।
सृष्टि के इस असंतुलन को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मा जी को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने यह समझा कि संहारक ऊर्जा (रुद्र) को सीधे प्रजावृद्धि के कार्य में लगाना उचित नहीं है, बल्कि उसे विभाजित करके उसके गुणों को नियामक बनाना आवश्यक है।
ब्रह्मा का आदेश: आत्म-विभाजन एवं सृष्टि का संचालन
ब्रह्मा जी द्वारा रुद्र को उपदेश: "विभजस्व आत्मानम्" (अपने आपको विभाजित करो)
रुद्र की प्रजा द्वारा उत्पन्न किए गए विनाश और रोदन को देखकर, ब्रह्मा जी ने रुद्र को उपदेश दिया। उन्होंने रुद्र से कहा कि उन्हें इस प्रकार की विनाशकारी सृष्टि को जन्म नहीं देना चाहिए, जो केवल रोदन और भय उत्पन्न करे।
ब्रह्मा जी ने रुद्र को सृष्टि के स्थायित्व के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आदेश दिया: "विभजस्व आत्मानं सौम्याघोरम्" अर्थात्, "अपने स्वरूप को शांत (सौम्य) और भयंकर (अघोर या घोर)—इन दो प्रकारों में विभाजित करो"।
इस विभाजन का मौलिक उद्देश्य सृष्टि में संतुलन स्थापित करना था। केवल उग्र शक्ति से सृष्टि नहीं चल सकती। सौम्य रूप (शिव, शंभू) पालन और मंगल के लिए आवश्यक है, जबकि अघोर रूप (भव, भीम) संहार और शुद्धि के लिए अनिवार्य है। यह आदेश सृजन में द्वैत (संरक्षण और विनाश का संतुलन) स्थापित करने का नियामक सिद्धांत था।
रुद्र का विभाजन: एकादश रुद्रों का प्राकट्य
ब्रह्मा जी के आदेश का पालन करते हुए, रुद्र (जो मूलतः अर्धनारीश्वर थे) ने सर्वप्रथम स्वयं को दो तत्वों में विभाजित किया: पुरुष (स्थिर चेतना) और स्त्री (गतिशील शक्ति)।
पुरुष रूप का विभाजन: पुरुष रूप पुनः ग्यारह भागों में विभाजित हुआ, जिन्हें एकादश रुद्र कहा गया। विष्णु पुराण में इन ग्यारह रुद्रों के नाम स्पष्ट रूप से दिए गए हैं, जो सृष्टि में विभिन्न कार्यों के अधिष्ठाता हैं। इन एकादश रुद्रों में से कुछ श्वेत (सौम्य) और शांताकृति थे, जबकि अन्य कृष्ण (श्याम) और उग्र (भयंकर) थे।
स्त्री रूप का विभाजन: स्त्री स्वरूप भी पुरुष रूप के समान ही ग्यारह भागों में विभक्त हुआ। ये शक्तियाँ एकादश रुद्रों की पत्नियाँ (रुद्राणियाँ) कहलाईं। ये रुद्राणियाँ, जिन्हें रुद्र की शक्तियाँ कहा गया है, उनके कार्यकलापों में उनका सहयोग करती हैं।
रुद्र की अष्ट-मूर्तियाँ और दार्शनिक कार्य
सृष्टि में रुद्र के कार्यकलापों को व्यवस्थित करने के लिए ब्रह्मा जी ने उन्हें न केवल नाम दिए, बल्कि उनके आठ अधिष्ठान (स्थान) भी स्थापित किए। ये अष्टमूर्ति के नाम से विख्यात हैं, जो प्रकृति के आठ मूलभूत तत्त्वों में स्थित हैं।
अष्टमूर्तियों और उनके अधिष्ठान का दार्शनिक अर्थ यह है कि रुद्र संसार के कण-कण में, जड़ और चेतन, दोनों में व्याप्त हैं। उनके नाम और अधिष्ठान इस प्रकार हैं:
| रुद्र की मूर्ति का नाम | अधिष्ठान (तत्त्व) | दार्शनिक स्वरूप का अर्थ |
|---|---|---|
| भव | मही (पृथ्वी) | सम्पूर्ण अस्तित्व, जगत का अधिपति (अधिभौतिक स्थिरता) |
| शर्व | जल | पोषण और जीवनदायिनी शक्ति (जलीय तत्त्व) |
| ईशान | आकाश (व्योम) | व्यापकता, स्थान और विस्तार |
| पशुपति | अग्नि (तेज) | ऊर्जा, ताप और ज्ञान की अग्नि |
| भीम | वायु | बल, गति और प्राण-संचार |
| उग्र | सूर्य | प्रचंड ताप, प्रकाश और काल-विभाजन |
| महादेव | चन्द्रमा | शीतलता, मन, और पोषण का आधार |
| रुद्र | यजमान (आत्मा/चेतना) | चेतन सत्ता, कर्म और आध्यात्मिक संहारक |
दार्शनिक महत्व: ये आठ रूप भौतिक जगत (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि) तथा खगोलीय तत्त्वों (सूर्य, चन्द्रमा) और यहाँ तक कि मानव की आध्यात्मिक चेतना (यजमान)—इन तीनों आयामों में रुद्र के कार्य को स्थापित करते हैं। 'यजमान' (यज्ञ करने वाला) के रूप में रुद्र का अधिष्ठान यह दर्शाता है कि वे केवल संहार के देवता नहीं हैं, बल्कि वे चेतना और कर्म के भी स्वामी हैं। इस प्रकार, रुद्र भौतिक, खगोलीय और आंतरिक, सभी क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
यह अष्टमूर्ति सिद्धांत यह भी सिद्ध करता है कि ब्रह्मा ने रुद्र को सृष्टिकर्ता के रूप में स्थापित किया, जो व्यष्टि (व्यक्तिगत शरीर) और समष्टि (ब्रह्माण्ड) दोनों में कार्य करते हैं। यदि रुद्र केवल बाह्य देवता होते, तो वे सृष्टि का नियमन कैसे करते? इसलिए उन्हें शरीर के आंतरिक क्रियाकलापों (प्राण, मन, चेतना) का अधिष्ठाता बनाया गया है।
एकादश रुद्र एवं उनकी पत्नियाँ
विष्णु पुराण में वर्णित एकादश रुद्रों के नाम
मूल रुद्र स्वरूप को सौम्य और अघोर भागों में विभाजित करने के उपरान्त, उनके पुरुष स्वरूप ने जो ग्यारह रूप धारण किए, वे एकादश रुद्र कहलाए। विष्णु पुराण में वर्णित एकादश रुद्रों के नाम और उनके युग्मों का विवरण इस प्रकार है, जो सृष्टि के ग्यारह प्रमुख क्रियाकलापों को दर्शाते हैं: मन्यु मनु महिनस् (महान्) महत् शिव ऋतध्वज उग्ररेतस् भव काल वामदेव धृतव्रत।
एकादश रुद्राणियाँ और उनका दार्शनिक महत्व
इन ग्यारह रुद्रों के साथ उनकी ग्यारह पत्नियाँ (रुद्राणियाँ) भी प्रकट हुईं, जो उनकी शक्ति (शक्तियाँ) हैं। ये रुद्राणियाँ रुद्रों के कार्यों को साकार करने वाली गतिशील ऊर्जाएँ हैं।
स्त्री स्वरूप के विभाजन से प्रकट रुद्राणियाँ इस प्रकार हैं: धी (धारणा/बुद्धि) वृत्ति (प्रवृत्ति/कर्म) उशना (अभिलाषा) ऊर्णा (या उमा) नियुता (नियम) सर्पि (प्रकाश/घृत) इला (पृथ्वी) अम्बिका (जगन्माता) इरावती (सूर्य रश्मि) सुधा (अमृत/पोषक) दीक्षा (संकल्प)।
रुद्र-रुद्राणी युग्मों का गहन भाष्य: यह युग्म सृष्टि के मूलभूत दार्शनिक कार्यकलापों को दर्शाते हैं। ये देवता केवल नाम नहीं हैं, बल्कि ये ब्रह्माण्डीय प्रक्रियाएँ हैं:
मन्यु और धी: मन्यु क्रोध या प्रचंड शक्ति का प्रतीक है। धी बुद्धि और धारणा शक्ति है। यह युग्म दर्शाता है कि प्रचंड, विनाशकारी ऊर्जा (रुद्र) को नियंत्रित करने और उसे रचनात्मक संहार (जैसे अशुद्धि का नाश) में लगाने के लिए प्रखर बुद्धि (धी) का सहयोग आवश्यक है। यह संयम और शक्ति का संतुलन है।
भव और अम्बिका: भव का अर्थ है 'अस्तित्व' या समस्त प्राणियों का अधिपति। अम्बिका जगन्माता और पोषण की शक्ति हैं। यह युग्म समस्त प्राणियों के अस्तित्व (भव) को पृथ्वी (इला/अम्बिका) के पोषण और आधार से जोड़ता है।
काल और इरावती: काल स्वयं समय है। इरावती सूर्य की रश्मि या प्रकाश है। समय (काल) का विभाजन और अनुभव सूर्य की गति (प्रकाश) के माध्यम से ही होता है। अतः यह युग्म काल की अविनाशी सत्ता और उसकी गतिशील अभिव्यक्ति को दर्शाता है।
धृतव्रत और दीक्षा: धृतव्रत का अर्थ है दृढ़ संकल्प को धारण करने वाला। दीक्षा नियम, व्रत, या आध्यात्मिक कठोरता का प्रतीक है। यह युग्म आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए आवश्यक दृढ़ता (धृतव्रत) और उस मार्ग के पालन (दीक्षा) की शक्ति का प्रतीक है।
| रुद्र (पुरुष तत्व - ऊर्जा) | रुद्राणी (स्त्री तत्व - शक्ति/आधार) | दार्शनिक स्वरूप एवं क्षेत्र | अधिष्ठान (कार्य क्षेत्र) |
|---|---|---|---|
| मन्यु | धी (बुद्धि/धारणा) | प्रचंड शक्ति और विचार शक्ति का संयोग | हृदय/आकाश |
| मनु | वृत्ति (कर्म/प्रवृत्ति) | संकल्प और कर्म का प्रवाह | इन्द्रिय/वायु |
| महिनस् | उशना (अभिलाषा) | महा बल और तेज (आयु का आधार) | आयु |
| महत् | उमा (सौम्यता/प्रकाश) | विशालता और सामंजस्य (विस्तार) | व्योम (अंतरिक्ष) |
| शिव | नियुता (आवश्यकता/नियम) | कल्याण और प्राणों का संचार | वायु (प्राण) |
| ऋतध्वज | सर्पि (प्रकाश/घृत) | सत्यनिष्ठा और यज्ञ तेज | अग्नि |
| उग्ररेतस् | इला (पृथ्वी/जल की शक्ति) | प्रचंड वीर्य और जलीय शक्ति | जल |
| भव | अम्बिका (जगन्माता) | सम्पूर्ण जगत का अधिपति (अस्तित्व) | मही (पृथ्वी) |
| काल | इरावती (सूर्य रश्मि/प्रकाश) | समय और उसका विभाजन | सूर्य |
| वामदेव | सुधा (अमृत/पोषक) | सौम्य देवत्व और पोषण | चन्द्रमा |
| धृतव्रत | दीक्षा (संकल्प/व्रत) | दृढ़ता और आध्यात्मिक नियम | तप |
रुद्रों के अधिष्ठान: सूक्ष्म एवं स्थूल क्षेत्र में कार्य
ब्रह्मा जी ने इन एकादश रुद्रों को सृष्टि में ग्यारह महत्त्वपूर्ण स्थान सौंपे। ये स्थान केवल बाह्य जगत में नहीं, अपितु व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर में भी व्याप्त हैं। बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार, ये एकादश रुद्र शरीर में स्थित दस प्राण (दस इन्द्रियों के अधिष्ठाता) और ग्यारहवें आत्मा (मन या चेतना) के रूप में कार्य करते हैं। अंतरिक्ष में स्थित वायु ही शरीर में प्राणरूप होकर दस स्थानों में कार्य करता है, और आत्मा ग्यारहवें रुद्रप्राण के रूप में जाना जाता है।
यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि रुद्र की शक्ति संसार में संतुलन बनाए रखने, संहार करने, और क्लेशों को दूर करने के लिए हर समय उपलब्ध रहे। रुद्रगण अंतरिक्ष लोक के देवता कहे जाते हैं और वे भौतिक जगत की सीमा से परे भी कार्यरत हैं। यह सृष्टि के आंतरिक और बाह्य, सूक्ष्म और स्थूल, सभी पहलुओं में रौद्र शक्ति के नियमन को प्रदर्शित करता है।
सार्वभौम व्यवस्था का नियमन: ब्रह्मा द्वारा रुद्र शक्ति का विभाजन और नियमन (सौम्य/अघोर) सृष्टि में संतुलन स्थापित करने का एक नियामक सिद्धांत है। यह दर्शाता है कि सृजन के लिए संहारक ऊर्जा (रुद्र) अनिवार्य है, किन्तु इस ऊर्जा को नियंत्रित किया जाना चाहिए। यदि यह ऊर्जा अनियंत्रित रहे, तो सृष्टि केवल नष्ट हो जाएगी। रुद्र का यह विभाजन यह दिखाता है कि संहार और योग की शक्ति व्यक्ति के भीतर भी कार्यरत है, जो उसे क्लेशों से मुक्त करती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
खंड द्वितीय: भगवान् तथा लक्ष्मीजी की सर्वव्यापकता
शक्ति और शक्तिमान का अद्वैत दर्शन
रौद्र सृष्टि के जटिल क्रम को समझाने के उपरान्त, महर्षि पराशर अब परम सत्य की ओर मैत्रेय का ध्यान आकर्षित करते हैं—वह सत्य जो समस्त भेदों (जैसे रुद्र का रौद्र और सौम्य रूप) से परे है। यह परम सत्य भगवान् श्री हरि विष्णु और उनकी अविच्छिन्न शक्ति श्री लक्ष्मी के अनादि, अद्वैत स्वरूप में स्थित है।
श्री हरि और श्री लक्ष्मी का सनातन, अविच्छिन्न सम्बन्ध (शाश्वत योग)
महर्षि पराशर दृढ़तापूर्वक समझाते हैं कि श्री लक्ष्मी जी और भगवान् श्री हरि विष्णु का सम्बन्ध ऐसा है जिसे किसी भी स्थिति में अलग नहीं किया जा सकता। यह सम्बन्ध अग्नि और उसकी उष्णता के समान है। जिस प्रकार उष्णता (गर्मी) को अग्नि से पृथक करने की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार श्री लक्ष्मी जी को भगवान् श्री हरि से अलग नहीं किया जा सकता।
श्री लक्ष्मी जी केवल विष्णु की पत्नी या सहचरी नहीं हैं; वे साक्षात् उनकी आदि शक्ति हैं, जो जगत् में क्रियाशील रहती हैं। वे नारायण की क्रियाशक्ति (क्रिया), ज्ञानशक्ति (धी), बलशक्ति (बल), और उनकी इच्छाशक्ति (विल) का साक्षात् रूप हैं।
अद्वैत का कार्य-कारण सिद्धांत: विष्णु परम पुरुष और विश्वरूप हैं, और समस्त व्यक्त जगत् उन्हीं से उत्पन्न होता है। यह सर्वव्यापकता ही श्री लक्ष्मी जी को भी सर्वव्यापी बनाती है। विष्णु तत्त्व (पुरुषवाची) हैं, जो स्थिर और अपरिवर्तनीय है; जबकि लक्ष्मी तत्त्व (स्त्रीवाची) हैं, जो गतिशील, क्रियाशील और अभिव्यक्त है। यह द्वैत केवल कार्य-कारण के स्तर पर प्रकट होता है, जबकि परमार्थतः दोनों एक ही हैं। वे दोनों अविच्छिन्न रूप से समस्त चराचर जगत में व्याप्त हैं, जहाँ पुरुष तत्त्व में विष्णु और स्त्री तत्त्व में लक्ष्मी का निवास है।
सर्वव्यापकता की आवश्यकता
चूँकि भगवान् विष्णु ही विश्वरूप हैं, और समस्त सृष्टि उन्हीं के अधीन है—उन्हीं में स्थित है और वे ही इसके कर्ता हैं —इसलिए उनकी शक्ति (लक्ष्मी) का भी समस्त चराचर जगत में व्याप्त होना अनिवार्य है। यदि लक्ष्मी केवल स्वर्ग या वैकुण्ठ तक सीमित होतीं, तो विष्णु की शक्ति संसार में पूर्ण रूप से कार्य नहीं कर पाती।
महर्षि पराशर ने सृष्टि के संचालन के लिए आवश्यक द्वैत (गतिशील और स्थिर, प्रकाश और अंधकार, देने वाला और ग्रहण करने वाला) को समझाने हेतु उपमानों की एक लंबी श्रृंखला प्रस्तुत की। ये उपमान सिद्ध करते हैं कि संसार का कोई भी पक्ष (चाहे वह भौतिक हो या अमूर्त, सकारात्मक हो या नकारात्मक) उस परम युगल से बाहर नहीं है। यह दर्शन विष्णु पुराण के परम वैष्णव सिद्धांत की स्थापना करता है, जो व्यवहारिक द्वैत में भी परमार्थिक अद्वैत को देखता है।
युगल स्वरूपों का विस्तृत उपमान-वर्णन
महर्षि पराशर अब विविध, अत्यंत गहन और काव्यात्मक दृष्टान्तों के माध्यम से श्री हरि और श्री लक्ष्मी की सर्वव्यापकता को मैत्रेय के समक्ष स्पष्ट करते हैं। प्रत्येक उपमान सृष्टीय क्रियाकलाप के पुरुष और प्रकृति तत्त्व को उजागर करता है।
काल और समय के संदर्भ में युग्म
श्री हरि: मुहूर्त, श्री लक्ष्मी जी: कला। महर्षि पराशर कहते हैं कि वे सर्वेश्वर श्री हरि मुहूर्त (समय की बड़ी इकाई, जैसे दो घड़ी) हैं, और श्री लक्ष्मी जी कला (समय की अत्यंत सूक्ष्म इकाई) हैं।
गहन भाष्य: काल (समय) स्वयं भगवान विष्णु का एक महत्त्वपूर्ण रूप है—कालस्वरूपं विष्णोश्च। मुहूर्त काल का वह स्थिर और मापनीय खंड है जो चेतना (पुरुष) द्वारा निर्धारित होता है। कला, इसके विपरीत, उस समयखंड के भीतर होने वाली गति, क्षणभंगुरता और सूक्ष्म क्रियाशक्ति है, जिसका नियंत्रण लक्ष्मी (प्रकृति) करती हैं। इस प्रकार, विष्णु काल का आधार हैं और लक्ष्मी काल की गतिशील अभिव्यक्ति। काल की स्थिरता (मुहूर्त) पुरुष है, और उसकी सूक्ष्म अभिव्यक्ति (कला) प्रकृति है। यह युगल समस्त कालचक्र का अधिष्ठान है।
प्रकाश और ज्ञान के संदर्भ में युग्म
सर्वेश्वर सर्वरूप श्री हरि: दीपक, श्री लक्ष्मी जी: ज्योति। सर्वेश्वर, सभी रूपों में व्याप्त, श्री हरि स्वयं दीपक (आधार) हैं, और श्री लक्ष्मी जी उस दीपक की ज्योति (प्रकाश/ऊर्जा) हैं।
गहन भाष्य: दीपक उस आधारभूत सत्ता (विष्णु) का प्रतीक है, जो स्वयं में स्थिर, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है। यह परम चेतना है। ज्योति (प्रकाश या दीप्ति) उस आधार से प्रकट होने वाली शक्ति (लक्ष्मी) है, जो संसार को प्रकाशित करती है, अंधकार को दूर करती है और ज्ञान प्रदान करती है। ज्योति के बिना दीपक का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता, और दीपक (स्थिर आधार) के बिना ज्योति (गतिशील अभिव्यक्ति) का कोई आधार नहीं। इसलिए, विष्णु प्रकाश का स्रोत (आधार) हैं और लक्ष्मी वह प्रकाश (अभिव्यक्ति) हैं। यह उपमान ज्ञान और उसकी दीप्ति के अद्वैत को दर्शाता है।
वानस्पतिक और आश्रय रूप में युग्म
श्री विष्णु: वृक्ष, जगन्न माता श्री लक्ष्मी जी: लता। श्री विष्णु स्वयं वृक्ष रूप हैं, और जगन्न माता श्री लक्ष्मी जी लता रूप हैं।
गहन भाष्य: वृक्ष पुरुष तत्त्व (स्थिर चेतना, दृढ़ता, आश्रय) का प्रतीक है। वृक्ष स्थिर रहता है, किन्तु वह अपने फलों और छाया से पोषण प्रदान करता है। लता प्रकृति (गतिशील शक्ति, सृजनात्मकता, कोमलता) का प्रतीक है, जो स्वयं खड़ी नहीं हो सकती, बल्कि पुरुष (वृक्ष) से लिपटकर ही ऊपर चढ़ती है और फलती-फूलती है। यह उपमान प्रकृति के नियम को दर्शाता है: प्रकृति (लक्ष्मी) पुरुष (विष्णु) के आधार और चेतना से जुड़कर ही सृजन और पोषण के कार्य को सिद्ध करती है। उनका यह संयोग ही जगत में जीवन का विस्तार करता है।
४ द्वैत और समय-विभाजन में युग्म
चक्र गदाधर देव श्री विष्णु: दिन, श्री लक्ष्मी जी: रात्रि। चक्र गदाधर देव श्री विष्णु दिन (प्रकाश, कर्म, जागृति) हैं, और श्री लक्ष्मी जी रात्रि (विश्राम, शांति, संकोच) हैं।
गहन भाष्य: दिन और रात्रि कालचक्र के दो आवश्यक और विरोधी पहलू हैं। दिन कर्म और अभिव्यक्ति का समय है, जो पुरुष की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को दर्शाता है। रात्रि विश्राम, संकोच, और शक्ति-संग्रह का समय है, जो प्रकृति की अन्तर्मुखी और लयकारी शक्ति को दर्शाता है। सृष्टि के इन दोनों आवश्यक चक्रों—प्रकाशन (उत्थान) और विश्राम (लय)—के अधिष्ठाता वे स्वयं हैं। दिन के बिना रात्रि का लय अपूर्ण है, और रात्रि के बिना दिन का कर्म (क्रिया) संभव नहीं है। यह द्वैत सृष्टि के स्थायित्व (पालन) के लिए आवश्यक है।
संबंध और वरदान रूप में युग्म
वरदायक श्री हरि: वर (वरदाता/दूल्हा), पद्म निवासनी श्री लक्ष्मी जी: वधू (वरदान/दुल्हन)। वरदायक श्री हरि स्वयं वर (वरदान या दाता) हैं, और पद्म निवासनी श्री लक्ष्मी जी वधू (ग्रहण करने वाली, सौभाग्य या दुल्हन) हैं।
गहन भाष्य: 'वर' पुरुषवाची रूप है, जो देने वाला (दाता) और आशीर्वाद प्रदान करने वाला है। 'वधू' स्त्रीवाची रूप है, जो उस वर या सौभाग्य को धारण करने वाला (ग्राहिका) है। यह केवल सामाजिक संबंध नहीं है, बल्कि समस्त शुभ फलों और वरदानों के आदान-प्रदान का दार्शनिक आधार है। विष्णु वह दिव्य संकल्प हैं जो वरदान को उत्पन्न करता है, और लक्ष्मी वह शक्ति हैं जो उस संकल्प को फलित करती हैं और उसे धारण करती हैं। लक्ष्मी जी सौभाग्य, संपन्नता और सभी शुभ फलों की अधिष्ठात्री हैं, जो वर (विष्णु) से अविच्छिन्न हैं।
जल तत्व और प्रवाह रूप में युग्म
भगवान: नद (पुरुषवाची नदी), श्री जी: नदी (स्त्रीवाची नदी)। भगवान स्वयं नद (विशाल, पुरुषवाची जलस्रोत, जैसे सागर या बड़ी नदी) हैं और श्री लक्ष्मी जी नदी (स्त्रीवाची, प्रवाहशील जलधारा) हैं।
गहन भाष्य: नद और नदी का युग्म जीवन शक्ति (प्रवाह) के द्वैत को दर्शाता है। नद विशालता, गहराई और शक्ति का प्रतीक है, जो पुरुष के अपरिमित बल को दर्शाता है। नदी उसका प्रवाह, पोषण, और जीवनदायिनी क्रिया है। समस्त जल तत्व, जो सृष्टि के पालन के लिए परम आवश्यक है, इन्हीं युगल स्वरूपों की अभिव्यक्ति है। जहाँ नद स्थिर स्रोत का प्रतीक है, वहीं नदी उसकी गतिशीलता और जीवनदायिनी पोषण का प्रतीक है।
विजय, यश और पहचान में युग्म
कमल नयन भगवान: ध्वजा, कमलालया लक्ष्मी जी: पताका। कमल नयन भगवान विष्णु ध्वजा (स्तम्भ, अटल आधार) हैं, और कमलालया लक्ष्मी जी पताका (उस पर फहराने वाला यश, विजय का प्रतीक) हैं।
गहन भाष्य: ध्वजा वह ऊँचाई है, वह आधार है जो किसी सत्ता को स्थापित करता है। भगवान विष्णु वह आधारभूत सत्य हैं, वह नाम हैं, जिसके ऊपर समस्त जगत का आधार है। पताका वह है जो ध्वजा पर फहराकर उस नाम, यश और विजय की घोषणा करती है। लक्ष्मी जी वह अभिव्यक्ति, प्रसिद्धि और विजयश्री हैं जो भगवान विष्णु के परम सत्य को संसार में दृश्यमान बनाती हैं। विष्णु आधार हैं, लक्ष्मी उसकी सार्वभौम पहचान और विस्तार। यह युगल समस्त विजय और कीर्ति का कारण है।
मनोवृत्ति (आंतरिक भाव) रूप में युग्म
जगदीश्वर परमात्मा नारायण: लोभ, श्री लक्ष्मी जी: तृष्णा। जगदीश्वर परमात्मा नारायण स्वयं लोभ (संग्रह या प्राप्त करने की प्रवृत्ति) हैं, और श्री लक्ष्मी जी तृष्णा (उस संग्रह की ओर प्रेरित करने वाली तीव्र लालसा) हैं।
गहन भाष्य: यह उपमान अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है, क्योंकि लोभ और तृष्णा सामान्यतः नकारात्मक मनोवृत्तियाँ मानी जाती हैं। पराशर जी यह स्थापित करते हैं कि सृष्टि की कोई भी प्रवृत्ति (चाहे वह आसुरी हो या दैवी) उस परम युगल से बाहर नहीं है। लोभ पुरुष तत्त्व के रूप में संग्रह (अर्थात संसार में वस्तुओं की प्राप्ति और संचय) का कारक है, जबकि तृष्णा स्त्री तत्त्व के रूप में उस संग्रह की ओर प्रेरित करने वाली शक्ति, लालसा या कामना है।
यदि सृष्टि में इच्छा (तृष्णा) और प्रवृत्ति (लोभ) न हो, तो कर्म और गति रुक जाएगी। इस संदर्भ में, ये भाव सृष्टि की निरंतरता के मूल कारण हैं। नारायण पुरुष के रूप में वह शक्ति हैं जो 'होने' को प्रेरित करती है, और लक्ष्मी वह 'चाहत' (Desire) हैं जो क्रिया को जन्म देती हैं।
आनंद, प्रेम और अनुराग में युग्म
तथा हे मैत्रेय! रति और राग भी साक्षात् श्री लक्ष्मी और गोविंद रूप ही हैं। गोविंद (विष्णु) रति (प्रेम का आधार, आनंद) हैं, और श्री लक्ष्मी (उनकी प्रिय पत्नी) राग (अनुराग, प्रीति) हैं।
गहन भाष्य: समस्त लौकिक और आध्यात्मिक प्रेम, आनंद, और अनुराग (Attachment) इन्हीं युगल स्वरूपों की अभिव्यक्ति है। गोविंद वह परम आनंद का स्रोत हैं (आनंदस्वरूपो हि गोविंदः), और रति (लक्ष्मी) वह प्रेम की भावना है जो उस आनंद को ग्रहण करने और अनुभव करने के लिए आवश्यक है। प्रेम का आधार (रति) पुरुष है, और प्रेम की अभिव्यक्ति (राग) प्रकृति है। यह उपमान मनुष्य के आध्यात्मिक और भावनात्मक जीवन में भी युगल स्वरूप की अविच्छिन्न उपस्थिति को दर्शाता है।
सर्वव्यापकता का महात्म्य एवं उपसंहार
सर्वव्यापकता की अंतिम घोषणा महर्षि पराशर, उपमानों की यह विस्तृत श्रृंखला समाप्त करते हुए, अब मैत्रेय के समक्ष सर्वव्यापकता के परम सिद्धांत की अंतिम घोषणा करते हैं। वे कहते हैं: "अधिक क्या कहा जाए? संक्षेप में यह कहना चाहिए कि देव (देवता), त्रियक (पशु, पक्षी, तिर्यञ्च), और मनुष्य आदि समस्त प्राणियों में जो कुछ भी पुरुषवाची (पुल्लिंग) है, वह साक्षात् भगवान् हरि (विष्णु) हैं; और जो कुछ स्त्रीवाची (स्त्रीलिंग) है, वह जगन्न माता श्री लक्ष्मी जी हैं। उनके परे और कोई नहीं है।"
अद्वैत सिद्धांत की पुष्टि: यह घोषणा सृष्टि के समस्त द्वैत भावों को परम युगल स्वरूप में विलीन कर देती है। संसार में जितने भी नाम पुरुषवाचक हैं (जैसे राजा, पिता, पर्वत, सागर, तेज, पुरुष, मन), वे सभी श्री हरि के स्वरूप हैं। जितने भी नाम स्त्रीवाचक हैं (जैसे रानी, माता, पृथ्वी, नदी, रात्रि, शक्ति, बुद्धि, प्रकृति), वे सभी श्री लक्ष्मी के स्वरूप हैं। यह दार्शनिक निष्कर्ष सृष्टि की मूलभूत संरचना को परिभाषित करता है, जहाँ हर वस्तु पुरुष (चेतना) या प्रकृति (शक्ति) का ही रूप है।
समस्त द्वैत का विलय: इस अध्याय ने रौद्र सृष्टि (जहाँ भेद और विनाश है) की व्याख्या की, जिसके तुरंत बाद विष्णु-लक्ष्मी की सर्वव्यापकता (जहाँ कोई भेद नहीं) का वर्णन किया गया। यह दार्शनिक संक्रमण यह स्थापित करता है कि सृष्टि की जटिलताएँ, द्वंद्व, और यहाँ तक कि रौद्र भाव (क्रोध, मृत्यु) भी अंतिम सत्य नहीं हैं। अंतिम सत्य अविच्छिन्न और आनंदमय युगल स्वरूप है। इस ज्ञान का तात्पर्य है कि विकार, गुण और दोष आदि द्वंद्वों में जो कुछ भी व्याप्त है, वह सब उस कल्याण गुण स्वरूप परमात्मा (विष्णु) की शक्ति के कण मात्र से आवृत है।
समस्त चराचर जगत में पुरुष और स्त्री तत्त्व का अभेद
यह ज्ञान समस्त ब्रह्माण्ड को एक ही युगल-रूप में परिभाषित करता है। यह स्पष्ट होता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही चेतना (विष्णु) और उसकी क्रियाशील शक्ति (लक्ष्मी) का खेल है। जड़ हो या चेतन, स्थावर हो या जंगम—प्रत्येक तत्त्व में पुरुषत्व और स्त्रीत्व के रूप में ऊर्जा का प्रसार ही सृष्टि है।
यह दर्शन साधक को समभाव सिखाता है। जब वह हर पुरुषवाची वस्तु में हरि को और हर स्त्रीवाची वस्तु में लक्ष्मी को देखता है, तो उसके मन से भेद भाव और वैमनस्य समाप्त हो जाते हैं। इस सर्वरूपता के ज्ञान से व्यक्ति समस्त जीवों के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव धारण करता है।
अध्याय की समाप्ति और पराविद्या का ज्ञान
महर्षि पराशर ने इस प्रकार श्री विष्णु पुराण के प्रथम अंश में अष्टम अध्याय की कथा पूर्ण की।
यह वर्णन केवल पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह पराविद्या (सर्वोच्च ज्ञान) का आधार है। जिस ज्ञान के द्वारा इस प्रकार के निर्दोष, विशुद्ध, निर्मल, और एक रूप परमेश्वर को जाना और देखा जा सकता है, वही वास्तविक ज्ञान है और उसी का नाम पराविद्या है। जो ज्ञान इससे विपरीत है, जो केवल भेदों, विकारों, और भौतिक आसक्तियों पर आधारित है, उसे अपराविद्या (गौण ज्ञान) कहते हैं।
इस अध्याय का श्रवण और मनन करने से साधक को यह बोध होता है कि भगवान् विष्णु ही जो विश्वरूप के रूप में विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के मूल कारण हैं। वे अव्यक्त (कारण) और व्यक्त (कार्य) दोनों हैं; वे स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी हैं। परमार्थतः, वे विकार रहित, शुद्ध, अविनाशी, और सर्वदा एक रस हैं, और वे ही अपने भक्तों को संसार सागर से तारने वाले मुक्ति के हेतु हैं। इस ज्ञान को हृदय में धारण करने से समस्त क्लेशों का नाश होता है।






