विस्तृत उत्तर
साक्षी भाव ध्यान वेदांत और योग की सर्वोच्च साधनाओं में से एक है। 'साक्षी' का अर्थ है — द्रष्टा, जो देखता है पर उसमें लिप्त नहीं होता।
यह क्या है — इसमें साधक विचारों, भावनाओं और शरीर के अनुभवों को उसी तरह देखता है जैसे एक निष्पक्ष दर्शक किसी दृश्य को देखता है — बिना प्रतिक्रिया दिए, बिना आसक्त हुए, बिना धकेले। 'मैं विचारों का साक्षी हूँ, विचार मैं नहीं हूँ' — यही साक्षी भाव का मूल है।
विधि — आरामदायक आसन में बैठें, आँखें बंद करें। पहले कुछ मिनट श्वास पर ध्यान दें। अब विचारों को रोकने की कोशिश न करें — बल्कि उन्हें ऐसे देखें जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं। जब कोई विचार आए — उसे नाम दें: 'यह चिंता है', 'यह योजना है', 'यह स्मृति है' — और वापस श्वास पर आ जाएं। शरीर में कोई संवेदना हो तो उसे भी इसी भाव से देखें — 'यह भारीपन है', 'यह खुजली है।' कुछ भी बदलने की कोशिश न करें — बस देखते रहें।
आधार — माण्डूक्योपनिषद में 'साक्षी चेतना' का उल्लेख है। योगसूत्र (1.3) में 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' — वृत्तियों के शांत होने पर द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है — यही साक्षी भाव की परिणति है।
यह साधना धीरे-धीरे दैनिक जीवन में भी लागू होती है — जब क्रोध आए, तब भी 'मैं क्रोध का साक्षी हूँ' — यह भाव रखें।




