का सरल उत्तर
साक्षी भाव ध्यान में विचारों और भावनाओं को न रोकें, न उनमें डूबें — बल्कि उन्हें निष्पक्ष दर्शक की तरह देखें। 'मैं विचारों का साक्षी हूँ, विचार मैं नहीं हूँ' — यही मूल भाव है। योगसूत्र 1.3: 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' — वृत्ति-शांति पर साक्षी स्वरूप में स्थिति।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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