विस्तृत उत्तर
ध्यान में मन का भटकना पूर्णतः स्वाभाविक है — यह किसी की कमजोरी नहीं, बल्कि मन की प्रकृति है। पातंजल योगसूत्र (1.2) में कहा गया — 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' — योग मन की वृत्तियों का निरोध है, और यह निरोध तत्काल नहीं होता।
भगवद्गीता (6.26) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट उपाय बताया — 'यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।' अर्थात् मन जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ-वहाँ से लौटाकर आत्मा में स्थिर करते रहो। भटकना गलती नहीं — न लौटाना गलती है।
व्यावहारिक उपाय इस प्रकार हैं — ध्यान से पहले 5-10 मिनट प्राणायाम करें, इससे मन काफी शांत हो जाता है। श्वास को आधार बनाएं — जब मन भटके तो श्वास की ओर लौट आएं। श्वास सदैव वर्तमान में है, इसलिए यह सर्वश्रेष्ठ आधार है। एक निश्चित समय और स्थान तय करें — नियमितता से मन स्वयं उस समय ध्यान के लिए तत्पर हो जाता है। ध्यान की अवधि कम रखें — शुरू में 5-10 मिनट पर्याप्त हैं, धीरे-धीरे बढ़ाएं। इष्टदेव के मंत्र या नाम का मानसिक जाप करें — 'ॐ नमः शिवाय', 'राम राम' आदि। मन को दबाने की कोशिश न करें — जो विचार आए उसे साक्षी भाव से देखें और श्वास पर वापस लौटें।
संत कबीर ने कहा — 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत' — मन का पूर्ण शांत होना एक दीर्घकालीन साधना है। धैर्य और नियमितता ही एकमात्र मार्ग है।





