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त्रिपुर भैरवी साधना: षट्चक्र और चेतना जागरण की दुर्लभ विधि !
त्रिपुर भैरवी

त्रिपुर भैरवी साधना: षट्चक्र और चेतना जागरण की दुर्लभ

📿 पौराणिक•56 सेकंड पढ़ें
अंतिम अपडेट: 19 मई 2025
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"जानिए त्रिपुर भैरवी देवी की रहस्यमयी साधना विधि, विनियोग, न्यास, मंत्र सिद्धि और उनके उग्र स्वरूप की गूढ़ तांत्रिक महिमा

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त्रिपुर भैरवी मूल मंत्र
त्रिपुर भैरवी मूल मंत्र (साधना सिद्धि हेतु)
मंत्र:
हसैं हसकरीं हसैं
अथवा
ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥
विनियोग:
ॐ अस्य श्री त्रिपुर भैरवी मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि: पंक्तिश्छ्न्द: त्रिपुर भैरवी देवता वाग्भवो बीजं शक्ति बीजं शक्ति: कामराज कीलकं श्रीत्रिपुरभैरवी प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:
देवता: त्रिपुर भैरवी (दस महाविद्याओं में से एक)
स्रोत: भैरवी तंत्र, शक्ति संगम तंत्र आदि
प्रयोजन: चित्त-शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति, साधनाओं में सिद्धि, ज्ञान एवं भौतिक-आध्यात्मिक ऐश्वर्य की प्राप्ति।
विधि:
  • साधना का प्रारंभ विनियोग, ऋष्यादि न्यास, कर न्यास, हृदयादि न्यास से करें।
  • देवी त्रिपुर भैरवी का ध्यान करते हुए मूल मंत्र का जप करें।
  • जप हेतु लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।
  • साधना एकांत स्थान पर, शुद्धतापूर्वक करें।
महत्व: त्रिपुर भैरवी, जिन्हें षोडशी या ललिता के उग्र रूप में भी जाना जाता है, तीव्र ऊर्जा और शक्ति की देवी हैं। इनकी साधना साधक को कुंडलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन और त्रिलोक विजय की क्षमता देती है। यह महाविद्या अत्यंत शक्तिशाली है, किंतु कठिन साधना के कारण साधारण साधकों में अल्पज्ञात है।
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त्रिपुर भैरवी साधना: षट्चक्र और चेतना जागरण की दुर्लभ पर आगे क्या समझना जरूरी है

त्रिपुर भैरवी साधना: षट्चक्र और चेतना जागरण की दुर्लभ के विषय में इस लेख का मूल संकेत यह है: "जानिए त्रिपुर भैरवी देवी की रहस्यमयी साधना विधि, विनियोग, न्यास, मंत्र सिद्धि और उनके उग्र स्वरूप की गूढ़ तांत्रिक महिमा

त्रिपुर भैरवी श्रेणी के लेख आम तौर पर महत्व, विधि, समय, शास्त्रीय आधार और सावधानियों को अलग-अलग हिस्सों में खोलते हैं. Durga संग्रह के दूसरे लेख यही पृष्ठभूमि और गहरी करते हैं।

त्रिपुरभैरवी, साधनासिद्धि, तांत्रिक जैसे जुड़े विषय आगे पढ़ने से यह समझ आता है कि विषय का व्यवहारिक उपयोग क्या है, किन परिस्थितियों में नियम बदलते हैं और किस जानकारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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त्रिपुर भैरवी के और लेख पढ़कर इस विषय की पृष्ठभूमि पूरी करें।

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इसी विषय के 5 प्रश्न आपके व्यावहारिक संदेह साफ कर सकते हैं।

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नीचे दिए गए 12 संबंधित लेख इस पेज को आगे बढ़ाते हैं।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

मंदिर

मंदिर में किस दिशा में भगवान की मूर्ति होती है?

मूर्ति की दिशा: विष्णु — पूर्वमुखी (मानसार)। शिव — शिवलिंग पश्चिम, नंदी पूर्व (कामिकागम)। दुर्गा — उत्तरमुखी (मयमत)। गणेश — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)। दक्षिणामूर्ति — दक्षिणमुखी। गर्भगृह = मानव-हृदय का प्रतीक (अग्नि पुराण)।

शिव पूजा विधि

घर में शिवलिंग स्थापित करने के वास्तु नियम क्या हैं?

वास्तु नियम: शिवलिंग अंगूठे के आकार तक (4-6 इंच)। ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में स्थापित करें। जलधारी का मुख उत्तर दिशा में। नर्मदेश्वर/चांदी का शिवलिंग सर्वश्रेष्ठ। एक से अधिक न रखें। नित्य पूजा व जलाभिषेक अनिवार्य (लिंग पुराण)। ऊपर बाथरूम/किचन न हो।

शिव पूजा नियम

शिव की पूजा में दिशा का क्या महत्व है — उत्तर या पूर्व?

उत्तर सर्वोत्तम (कैलाश दिशा), पूर्व भी शुभ, ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) सर्वश्रेष्ठ। जलाधारी मुख उत्तर अनिवार्य। मुख उत्तर/पूर्व, पीठ दक्षिण/पश्चिम।

गणेश पूजा

गणेश जी की मूर्ति घर में किस दिशा में रखनी चाहिए?

ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)। मुख पूर्व/उत्तर। बाईं सूंड = गृहस्थ (सौम्य)। लक्ष्मी के बाईं ओर। प्रवेश द्वार = बाधा निवारक। शयनकक्ष में नहीं।

गृह मंदिर

घर में मंदिर कैसे बनाएं?

घर में मंदिर ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में बनाएं — यह सर्वोत्तम है। देवता का मुख पूर्व की ओर हो। शयन कक्ष और दक्षिण दिशा में मंदिर न बनाएं। मूर्ति की ऊँचाई हृदय के समांतर या ऊपर हो। खंडित मूर्ति घर में न रखें।

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