विस्तृत उत्तर
अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है 'मैं ब्रह्म हूँ'। यह महावाक्य साधक को यह बोध कराता है कि उसका अपना चैतन्य स्वरूप और वह विराट परब्रह्म एक ही हैं। ध्यान के समय जब साधक का अहंकार गलने लगता है, तब यह दर्शन उसका जीवित अनुभव बन जाता है कि वह देह नहीं बल्कि अविनाशी ब्रह्म है।

