दर्शनअहं ब्रह्मास्मि का अर्थ क्या है?अहं ब्रह्मास्मि = 'मैं ब्रह्म हूँ।' बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.10)। यह अहंकार नहीं, आत्मज्ञान का उद्घोष है — शुद्ध चैतन्य (शरीर-मन से परे) ही ब्रह्म है। लहर = समुद्र, कंगन = सोना। इस अनुभव को प्राप्त करना ही मोक्ष।#अहं ब्रह्मास्मि#महावाक्य#बृहदारण्यक उपनिषद
दक्षिणामूर्ति साधनाअहं ब्रह्मास्मि का मतलब क्या है?'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ है 'मैं ही ब्रह्म हूँ', जो जीव और ब्रह्म की एकता को बताता है।#अहं ब्रह्मास्मि#वेदांत#महावाक्य
भक्ति एवं आध्यात्मजीव ब्रह्म एकता का क्या अर्थ है?जीव और ब्रह्म मूलतः एक हैं — माया के कारण भिन्नता प्रतीत होती है। उपनिषद के महावाक्य जैसे 'अहं ब्रह्मास्मि' इसी सत्य को प्रकट करते हैं। अज्ञान के नाश से यह एकता अनुभव होती है।#जीव ब्रह्म एकता#अद्वैत#अहं ब्रह्मास्मि
ध्यान साधनाध्यान करने से आत्मज्ञान कैसे मिलता है?ध्यान में स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा — शरीर → श्वास → मन → बुद्धि → चेतना — के क्रम में आत्मज्ञान मिलता है। गीता (6/20-21) में समाधि में आत्मा को आत्मा से देखना ही आत्मज्ञान है। 'नेति नेति' विचार से जो शेष रहे — शुद्ध साक्षी — वही आत्मा है।#ध्यान#आत्मज्ञान#साक्षात्कार