विस्तृत उत्तर
जीव-ब्रह्म एकता का सिद्धांत अद्वैत वेदांत का सर्वोच्च दार्शनिक सत्य है। इसे आदि शंकराचार्य ने 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' — इस सूत्र में स्थापित किया।
इसका अर्थ है — ब्रह्म (परमात्मा) ही एकमात्र परम सत्य है; यह जो जगत दिख रहा है वह माया के कारण प्रतीत होता है; और जीव (व्यक्तिगत आत्मा) भी मूलतः ब्रह्म ही है, कोई अलग सत्ता नहीं।
उपनिषदों के चार महावाक्य इसी सत्य को विभिन्न रूपों में प्रकट करते हैं — 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक उपनिषद — मैं ब्रह्म हूँ), 'तत् त्वम् असि' (छांदोग्य उपनिषद — वह तुम हो), 'अयम् आत्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य उपनिषद — यह आत्मा ही ब्रह्म है) और 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐतरेय उपनिषद — चेतना ही ब्रह्म है)।
तो फिर जीव को यह भिन्नता क्यों अनुभव होती है? इसका कारण माया और अविद्या है। जैसे सूर्य का प्रतिबिंब पानी में पड़ने पर हिलता-डुलता प्रतीत होता है — वैसे ही ब्रह्म माया के कारण अनेक जीवों के रूप में भासित होता है। जब अज्ञान का नाश होता है, तो जीव को अपनी ब्रह्मस्वरूपता का बोध हो जाता है — यही मोक्ष है।
यह केवल बौद्धिक सिद्धांत नहीं, बल्कि ध्यान और समाधि की अनुभूति है जो योगी और ज्ञानी को स्वयं होती है।





