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ध्यान साधना📜 भगवद गीता 6/20-23, माण्डूक्योपनिषद 7, कठोपनिषद 2/24, बृहदारण्यक 4/4/22, मुण्डकोपनिषद 3/1/82 मिनट पठन

ध्यान करने से आत्मज्ञान कैसे मिलता है?

संक्षिप्त उत्तर

ध्यान में स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा — शरीर → श्वास → मन → बुद्धि → चेतना — के क्रम में आत्मज्ञान मिलता है। गीता (6/20-21) में समाधि में आत्मा को आत्मा से देखना ही आत्मज्ञान है। 'नेति नेति' विचार से जो शेष रहे — शुद्ध साक्षी — वही आत्मा है।

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विस्तृत उत्तर

## ध्यान करने से आत्मज्ञान कैसे मिलता है?

आत्मज्ञान की परिभाषा

आत्मज्ञान = 'मैं शरीर-मन नहीं, शुद्ध चेतना हूँ' — इसका प्रत्यक्ष अनुभव। यह बौद्धिक समझ नहीं — यह अपरोक्षानुभूति है।

ध्यान से आत्मज्ञान मिलने की प्रक्रिया

### 1. स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा

ध्यान में ध्यान-विषय क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म होता जाता है:

शरीर → श्वास → मन → बुद्धि → चेतना

जब विषय स्वयं चेतना हो जाती है — द्रष्टा और दृश्य एक होते हैं — यही आत्मज्ञान है।

### 2. 'नेति नेति' विचार ध्यान में

ध्यान में बैठकर — 'मैं शरीर नहीं', 'मैं श्वास नहीं', 'मैं विचार नहीं' — एक-एक कर छोड़ते जाएं। जो शेष रहे — शुद्ध साक्षी — वही आत्मा है।

### 3. समाधि में साक्षात्कार

गीता (6/20-21):

*'यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।

यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।'*

— जहाँ योग से निरुद्ध चित्त विरत हो जाता है, जहाँ आत्मा आत्मा को देखकर तृप्त होती है — वही समाधि है।

### 4. कुंडलिनी जागरण से चेतना का विस्तार

गहरे ध्यान से कुंडलिनी-शक्ति सहस्रार तक पहुँचती है — व्यक्ति-चेतना ब्रह्म-चेतना में विलीन होती है — 'अहं ब्रह्मास्मि' का साक्षात्कार।

### 5. धारणा → ध्यान → समाधि

योगसूत्र में यह तीनों मिलकर 'संयम' हैं। संयम से ही आत्मज्ञान प्रकट होता है।

मुण्डकोपनिषद (3/1/8)

*'विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्।।'*

— जो बुद्धि-सारथी से युक्त मन को वश में रखता है, वह उस विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद गीता 6/20-23, माण्डूक्योपनिषद 7, कठोपनिषद 2/24, बृहदारण्यक 4/4/22, मुण्डकोपनिषद 3/1/8
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