विस्तृत उत्तर
ध्यान और समाधि = क्रमिक अवस्थाएँ — ध्यान गहरा होकर समाधि बनता है। दोनों भिन्न परंतु अभिन्न।
योगसूत्र अनुसार
ध्यान (Dhyana — 7वाँ अंग)
योगसूत्र 3.2: 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' — एक विषय पर चित्त का निरंतर, अविच्छिन्न प्रवाह। ध्यान में: ध्याता (ध्यान करने वाला) + ध्येय (ध्यान का विषय) + ध्यान (प्रक्रिया) — तीनों अलग-अलग अनुभव होते हैं। 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' = अभी ध्यान।
समाधि (Samadhi — 8वाँ अंग)
योगसूत्र 3.3: 'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः' — जब ध्यान इतना गहरा हो कि केवल ध्येय (विषय) शेष रहे, ध्याता और ध्यान विलीन = समाधि। समाधि में: ध्याता+ध्येय+ध्यान = एक। 'मैं' विलय। केवल 'है'।
मुख्य भेद
| विषय | ध्यान | समाधि |
|---|---|---|
| 'मैं' का बोध | हाँ ('मैं ध्यान कर रहा') | नहीं ('मैं' विलय) |
| ध्याता-ध्येय भेद | अलग-अलग | एक (त्रिपुटी विलय) |
| प्रयास | सचेतन प्रयास | प्रयास-रहित (सहज) |
| अवधि | सीमित (मिनट/घंटे) | कालातीत (समय बोध नहीं) |
| बाह्य जगत बोध | आंशिक (आवाज सुनाई) | शून्य (सम्पूर्ण लीन) |
| नियंत्रण | साधक के हाथ | 'होता है' — करना नहीं |
समाधि के प्रकार
- ▸सम्प्रज्ञात (Savikalpa): विषय/बीज सहित — अभी कोई ध्येय शेष
- ▸असम्प्रज्ञात (Nirvikalpa): विषय-रहित — शुद्ध चेतना मात्र
- ▸सबीज/निर्बीज: बीज (संस्कार) सहित या रहित
- ▸धर्ममेघ समाधि: सर्वोच्च — विवेक ज्ञान का मेघ
उपमा: ध्यान = तेल की धारा (निरंतर परंतु अलग-अलग बूँदें)। समाधि = नदी का सागर में विलय (अब बूँद और सागर एक)।
व्यावहारिक: ध्यान = अभ्यास (कर सकते हैं)। समाधि = फल (स्वतः होता है — जबरदस्ती नहीं)। ध्यान करते रहें — समाधि अपने समय पर।




