विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ब्रह्म का वर्णन
तैत्तिरीय उपनिषद (2/1) — ब्रह्म की परिभाषा: 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' — ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है और अनंत है। यह उपनिषदों की सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म-परिभाषा है।
केनोपनिषद (1/3-9) — ब्रह्म अग्राह्य है: 'न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः।' — वहाँ न आँख जा सकती है, न वाणी, न मन। ब्रह्म मन का मन, आँख की आँख है। जो कहे 'मैं जानता हूँ' — वह नहीं जानता; जो कहे 'नहीं जानता' — वही जानता है।
बृहदारण्यक उपनिषद (3/9/26) — 'नेति नेति': 'यह नहीं, यह नहीं' — ब्रह्म का वर्णन नकारात्मक पद्धति से — क्योंकि कोई शब्द उसे पूर्णतः व्यक्त नहीं कर सकता।
माण्डूक्योपनिषद (1/2) — ओम् ही ब्रह्म: 'ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्।' — ओम् ही ब्रह्म है, भूत-भविष्य-वर्तमान सब ओम् है।
चार महावाक्य — ब्रह्म का सार
- ▸प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय) — चेतना ही ब्रह्म है
- ▸अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक) — मैं ब्रह्म हूँ
- ▸तत्त्वमसि (छान्दोग्य) — वह तू ही है
- ▸अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्य) — यह आत्मा ब्रह्म है
निर्गुण और सगुण ब्रह्म: निर्गुण ब्रह्म — शंकराचार्य का अद्वैत मत; सगुण ब्रह्म — ईश्वर रूप में उपास्य, रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत।





