विस्तृत उत्तर
उपनिषदों और वेदांत में ब्रह्मांड की उत्पत्ति ध्वनि से मानी गई है, जिसे 'नाद ब्रह्म' (Sound is God) कहा जाता है। 'ॐ' (अ-उ-म्) वह आदि और अनाहत (बिना किसी टकराव के उत्पन्न होने वाली) ध्वनि है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में निरंतर गूंज रही है।
ॐकार साधना इसी ब्रह्मांडीय ध्वनि से जुड़ने का मार्ग है। जब साधक 'अ' का उच्चारण नाभि से, 'उ' का हृदय से, और 'म्' का मस्तिष्क (आज्ञा चक्र) से करता है, तो उसके शरीर के तीनों लोक जाग्रत हो जाते हैं। ॐकार का गहरा और लंबा उच्चारण (उद्गीथ प्राणायाम) मन के सभी विचारों को शून्य कर देता है। निरंतर ॐकार साधना से साधक को बाहर की आवाज़ें सुनाई देना बंद हो जाती हैं और उसे अपने भीतर एक गूंज (नाद) सुनाई देने लगती है। इसी नाद ब्रह्म में लीन होना ही समाधि और परम मोक्ष की अवस्था है।





