विस्तृत उत्तर
वास्तु और तंत्र शास्त्र में वायव्य कोण (North-West) के अधिपति 'वायु' देव हैं। वायु प्राण का प्रतीक है — मानव देह में प्राण ही आयु का निर्धारण करता है और प्राण-वायु के देह से निर्गमन को ही 'मृत्यु' कहा जाता है।
चूंकि शंकुकर्णेश्वर महादेव की स्थापना इसी प्राण-दिशा (वायव्य कोण) में हुई है, अतः यह शिवलिंग सीधे तौर पर साधक के प्राणों (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) को नियंत्रित करने, आयु की रक्षा करने, वायु-जनित एवं असाध्य रोगों को नष्ट करने और अकाल मृत्यु को रोकने का परम सामर्थ्य रखता है।
यही कारण है कि आयु-रक्षा और मृत्यु-भय के निवारण के लिए विश्वेश्वर के वायव्य कोण में स्थित इस शिवलिंग की आराधना का विधान है।





