विस्तृत उत्तर
पुराणों और शास्त्रों में गंगातट पर मृत्यु को मोक्षदायक माना गया है। इसका विधान मुख्यतः काशीखण्ड, स्कंद पुराण और गरुड़ पुराण में मिलता है। गरुड़ पुराण में उल्लिखित सप्त मोक्षपुरी में काशी (वाराणसी) और हरिद्वार — दोनों गंगा के तट पर स्थित हैं।
काशी को 'मोक्ष की राजधानी' कहा जाता है। मान्यता है कि काशी के गंगातट पर, विशेषकर मणिकर्णिका घाट पर, मृत्यु होने पर स्वयं भगवान शिव उस जीवात्मा को 'तारक मंत्र' देते हैं जिससे उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह विधान काशीखण्ड (स्कंद पुराण) में विस्तार से वर्णित है।
गंगाजल को गरुड़ पुराण में अमृत के समान पवित्र कहा गया है। मृत्यु के समय मुख में गंगाजल डालने से आत्मा शुद्ध हो जाती है और पाप नष्ट होते हैं। जिस जीव के मुख में अंतिम समय में गंगाजल पड़ जाए, वह यमलोक के कठोर मार्ग से बच सकता है।
गंगातट पर मृत्यु का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि वहाँ का वातावरण स्वयं दिव्य माना गया है — गंगा की धारा, तुलसी, तीर्थ का पवित्र प्रभाव और निरंतर हरिनाम का वातावरण — ये सब मिलकर आत्मा को ऊर्ध्वगति देते हैं। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि सप्त मोक्षपुरी (अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका) में मृत्यु होने पर मोक्ष मिलता है — इनमें से तीन प्रमुख तीर्थ गंगातट पर ही स्थित हैं।
यह विधान केवल भौगोलिक स्थान तक सीमित नहीं है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि जो जीव जीवनभर सत्कर्म करता है और अंत में गंगाजल का स्पर्श या पान करते हुए प्राण त्यागता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।





