विस्तृत उत्तर
गंगा में अस्थि (हड्डियाँ/राख) विसर्जन हिन्दू धर्म में मोक्ष प्रदायिनी क्रिया मानी गई है:
- 1गंगा = मोक्षदायिनी: गरुड़ पुराण: 'गंगायां यस्य अस्थीनि तिष्ठन्ति...' — जिसकी अस्थियाँ गंगा में हैं, वह मोक्ष प्राप्त करता है। गंगाजल = पापनाशिनी — अस्थि गंगा स्पर्श = मृतक के सम्पूर्ण पापों का क्षय।
- 1विष्णु पद से उत्पन्न: गंगा = विष्णु पादोदक (विष्णु के चरणों से)। अस्थि गंगा में = विष्णु चरण स्पर्श = परम पवित्र।
- 1पुनर्जन्म चक्र मुक्ति: मान्यता: गंगा में अस्थि विसर्जन से मृतक को सद्गति (उत्तम लोक/मोक्ष) प्राप्त होती है — पुनर्जन्म चक्र से मुक्ति।
- 1स्कन्द पुराण: 'गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।' — दूर से भी 'गंगा-गंगा' कहने से पाप नष्ट। तो अस्थि गंगा में = असीम पुण्य।
प्रमुख स्थान: हरिद्वार (हर की पैड़ी), प्रयागराज (त्रिवेणी संगम), काशी (मणिकर्णिका/दशाश्वमेध), गंगासागर। काशी में अस्थि विसर्जन = शिव कान में तारक मंत्र = मोक्ष।
विधि: अस्थि (दाह संस्कार तीसरे दिन एकत्रित) → शुद्ध कपड़े में लपेटें → गंगा तट → स्नान → 'ॐ' सहित गंगा में विसर्जित → तर्पण → पिण्डदान → ब्राह्मण दान।
समय: मृत्यु के 3-10 दिन में। यदि शीघ्र सम्भव न हो = पितृपक्ष/मकर संक्रांति/कुम्भ पर।





