विस्तृत उत्तर
महाभारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के पास अनेक दिव्य अस्त्र थे जो उन्होंने देवताओं और गुरुजनों से प्राप्त किए।
सर्वोच्च महास्त्र — पाशुपतास्त्र: स्वयं भगवान शिव से प्राप्त। यह सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र था। ब्रह्मास्त्र: गुरु द्रोणाचार्य से प्राप्त। नारायणास्त्र: भगवान श्रीकृष्ण से प्राप्त। वरुणास्त्र: वरुण देव से। आग्नेयास्त्र: अग्निदेव से।
देवताओं से प्राप्त अस्त्र — देवराज इंद्र से: वज्रास्त्र, सम्मोहनास्त्र और अनेक दिव्य अस्त्र (स्वर्ग में एक वर्ष की शिक्षा के दौरान)। यमराज से: दंडास्त्र। कुबेर से: अंतर्धान अस्त्र। वायुदेव से: वायव्यास्त्र।
गुरुओं से प्राप्त — द्रोणाचार्य से: ब्रह्मशिर अस्त्र, संमोहन-प्रस्वापन अस्त्र। इसके अतिरिक्त ऐन्द्रास्त्र, तवास्त्र, सत्यास्त्र, क्रौंचास्त्र आदि।
गांडीव + अक्षय तरकश — यह उनका निजी धनुष और तरकश था जो उन्हें अग्निदेव ने दिया।
महाभारत की कथा के अनुसार अर्जुन ने स्वर्गलोक में एक वर्ष रहकर इंद्र से सभी दैवीय अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी।





