अजा एकादशी: ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं पारंपरिक स्रोतों पर आधारित संपूर्ण एवं प्रामाणिक व्रत कथा
कथा का पारंपरिक प्रारंभ: मंगलाचरण एवं स्तुति
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
सृष्टि के पालनहार, चराचर जगत के स्वामी, कमलनयन भगवान श्रीहरि विष्णु के श्रीचरणों में बारंबार वंदन है। जो भृगुपति हैं, जो रघुपति हैं, और जो यदुपति के रूप में अवतरित होकर धर्म की स्थापना करते हैं, उन अनंत, अविनाशी, निर्गुण और सगुण दोनों स्वरूपों में पूजे जाने वाले परब्रह्म परमात्मा को साष्टांग प्रणाम है । शास्त्रों और पुराणों में एकादशी तिथि को साक्षात भगवान श्रीहरि का स्वरूप माना गया है। मासों में सर्वोत्तम भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जो परम पुण्यदायिनी एकादशी आती है, उसे संपूर्ण भारतवर्ष में और समस्त पौराणिक ग्रन्थों में 'अजा एकादशी' अथवा 'अन्नदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है । इस परम पावन तिथि के अधिष्ठाता देव भगवान 'हृषीकेश' हैं, जो समस्त इंद्रियों के स्वामी हैं और जो अपने भक्तों की समस्त इंद्रियों को संसार के नश्वर विषयों से हटाकर अपनी शुद्ध प्रेमाभक्ति में लीन कर देते हैं ।
ब्रह्मवैवर्त पुराण और पद्म पुराण जैसे महान सात्विक ग्रंथों में अजा एकादशी का माहात्म्य अत्यंत विस्तार और श्रद्धा के साथ वर्णित है । यह कथा केवल एक आख्यान नहीं है, अपितु यह सत्य, धर्म और भगवत-कृपा का वह ज्वलंत प्रमाण है, जिसे एकादशी के पवित्र दिन पढ़ने या सुनने मात्र से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के संचित पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं, जैसे प्रज्वलित अग्नि में सूखी लकड़ियों का ढेर भस्म हो जाता है । नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में शौनकादि अठासी हजार ऋषियों के समक्ष सूत जी महाराज ने जिस कथा का वाचन किया था, उसी पारंपरिक और प्रामाणिक कथा का यहाँ अक्षरशः वर्णन किया जा रहा है。
युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
द्वापर युग के उस परम पवित्र कालखंड में, जब कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ शासन कर रहे थे, तब उनके मन में प्रजा के कल्याण और संपूर्ण मानव जाति के पापों के प्रायश्चित हेतु एकादशी व्रतों के माहात्म्य को जानने की तीव्र उत्कंठा जागृत हुई। एक दिन, परम रमणीक सभा में, जहाँ त्रिलोकीनाथ, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे, धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनयपूर्वक, हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर भगवान से लोक-कल्याण की भावना से एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न किया。
पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत यह श्लोक प्राप्त होता है, जहाँ युधिष्ठिर अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं:
युधिष्ठिर उवाच— "भाद्रस्य कृष्णपक्षे तु किंनामैकादशीभवेत्। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथयस्व जनार्दन॥"
अर्थात: धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा— "हे जनार्दन! हे यदुनंदन! हे कमलनयन! भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जो परम कल्याणकारी एकादशी आती है, उसका नाम क्या है? उस एकादशी के अधिष्ठाता देवता कौन हैं? उस दिन किस विधि से भगवान की उपासना की जाती है और उस पावन व्रत के प्रभाव से किस फल की प्राप्ति होती है? हे मधुसूदन, आप तो सर्वज्ञ हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान आपके करतल में हैं। आप कृपा करके मुझे इस एकादशी का संपूर्ण माहात्म्य और उससे जुड़ी वह पवित्र कथा विस्तारपूर्वक सुनाने की कृपा करें, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य संसार के समस्त दुखों, कष्टों और पापों से मुक्त होकर अंत में आपके परम धाम को प्राप्त कर लेता है ।"
श्रीकृष्ण द्वारा अजा एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त, विनम्र और लोक-कल्याणकारी वचनों को सुनकर तीनों लोकों के स्वामी, देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अत्यंत मधुर और करुणापूर्ण मुस्कान छा गई । भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत मधुर, गंभीर और मेघ के समान गर्जना करने वाली वाणी में बोले—
"हे राजन्! हे धर्मपुत्र युधिष्ठिर! तुमने संपूर्ण लोकों के कल्याण के लिए, अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए मनुष्यों के उद्धार के लिए अत्यंत ही उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। तुम्हारी भगवत-भक्ति और प्रजा-वात्सल्य को देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम एकाग्र चित्त होकर श्रवण करो। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जो महान पुण्यदायिनी एकादशी आती है, तीनों लोकों में उसे 'अजा एकादशी' अथवा 'अन्नदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है ।
"मासि भाद्रपदे राजन् कृष्ण पक्ष इति शोभना। एकादशी समायाता अजा नाम इति पुण्य दा॥"
हे कुंतीपुत्र! यह अजा एकादशी 'सर्वपाप नाशिनी' है । इस परम पवित्र दिन भगवान विष्णु के 'हृषीकेश' स्वरूप की पूर्ण विधि-विधान, श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा की जाती है । जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियमों के साथ इस एकादशी का निराहार उपवास करता है, भगवान हृषीकेश की आराधना करता है और रात्रि में जागरण करते हुए मेरे नाम का कीर्तन करता है, उसके पूर्व जन्मों के घोर पाप, ब्रह्महत्या जैसे दोष, और इस जन्म के समस्त ज्ञात-अज्ञात पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार का समूल नाश हो जाता है ।
हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की महिमा को सिद्ध करने वाली एक अत्यंत प्राचीन, अद्भुत और हृदय को द्रवित कर देने वाली पौराणिक कथा है। यह कथा सूर्यवंश के परम प्रतापी, सत्यवादी और धर्मपरायण चक्रवर्ती सम्राट राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी है । प्राचीन काल में, इसी अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र ने अपनी नष्ट हुई संपूर्ण राजकीय सत्ता, अपना खोया हुआ राज्य, अपनी मृत संतान और अपनी बिछुड़ी हुई पत्नी को पुनः प्राप्त किया था । अब मैं तुम्हें वह संपूर्ण और अक्षुण्ण आख्यान विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जिसे पूर्ण ध्यान और श्रद्धा के साथ श्रवण करने मात्र से मनुष्य को 'अश्वमेध यज्ञ' करने के समान महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है । तुम इसे स्थिर चित्त होकर सुनो।"
मुख्य कथा: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का महा-आख्यान
अयोध्या नगरी का परम पावन और अलौकिक वर्णन
भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— "हे धर्मराज! प्राचीन काल में, सतयुग के परम पावन समय में, पवित्र सरयू नदी के सुरम्य तट पर साकेत धाम स्थित था, जिसे मृत्युलोक में 'अयोध्या नगरी' के नाम से जाना जाता है । यह वही अयोध्या है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में भगवान श्रीहरि की परम प्रिय नगरी है और जो मनु के समय से ही इक्ष्वाकु वंश की राजधानी रही है। अयोध्या नगरी की शोभा और उसकी भव्यता का वर्णन साक्षात शेषनाग भी अपने सहस्त्र मुखों से नहीं कर सकते。
वह नगरी धन-धान्य, मणि-रत्नों, स्वर्ण से निर्मित गगनचुंबी प्रसादों और तपस्वियों के दिव्य आश्रमों से परिपूर्ण थी। उस नगरी के चारों ओर अत्यंत ऊंचे-ऊंचे और सुदृढ़ परकोटे बने हुए थे, जिन पर शूरवीर, धनुर्धारी योद्धा निरंतर धर्म और राज्य की रक्षा के लिए तत्पर रहते थे। अयोध्या के मार्गों पर सर्वत्र चंदन और सुगंधित जल का छिड़काव होता था। वहां के चौराहों, मंदिरों और आश्रमों से अष्टयाम वेद-ध्वनि गूंजती रहती थी ।
अयोध्या की प्रजा पूर्णतः धर्मनिष्ठ थी। वहां के ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र, स्वाध्याय, तप और यज्ञ में लीन रहते थे। क्षत्रिय अपनी प्रजा की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करते थे और कभी युद्ध से पीछे नहीं हटते थे। वैश्य अत्यंत ईमानदारी से व्यापार और कृषि करते थे, तथा शूद्र पूर्ण सेवा-भाव और निष्ठा से समाज को सुदृढ़ बनाते थे। उस नगरी में कोई भी मनुष्य दरिद्र नहीं था, कोई रोगी नहीं था, कोई दुखी नहीं था, कोई भी व्यक्ति अल्पायु में मृत्यु को प्राप्त नहीं होता था और कोई भी कुरूप नहीं था। वहां की सभी स्त्रियां पतिव्रता और शीलवती थीं। सभी नर-नारी धर्म के मार्ग पर चलने वाले, सदैव सत्य बोलने वाले और भगवान विष्णु के परम अनन्य भक्त थे । ऐसी परम दिव्य और अलौकिक अयोध्या नगरी पर सूर्यवंश के एक महान राजा का शासन था。
राजा हरिश्चन्द्र का परिचय एवं उनका सत्यनिष्ठ जीवन
उसी परम दिव्य अयोध्या नगरी में सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) में एक अत्यंत महान, चक्रवर्ती, प्रतापी और धर्म-धुरंधर राजा राज्य करते थे, जिनका नाम हरिश्चंद्र था । राजा हरिश्चंद्र अपने शारीरिक बल, क्षात्र-प्रताप, निष्पक्ष न्याय और सबसे बढ़कर अपनी 'सत्यनिष्ठा' के लिए त्रिलोकी में विख्यात थे । देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर और ऋषि-मुनि भी अपने आश्रमों में उनके सत्य और धर्म की भूरि-भूरि प्रशंसा किया करते थे। राजा हरिश्चंद्र ने अपने जीवन में यह कठोर व्रत धारण कर रखा था कि चाहे उनके प्राण ही क्यों न चले जाएं, चाहे सूर्य अपनी उष्णता त्याग दे या चंद्रमा अपनी शीतलता छोड़ दे, परंतु वे कभी असत्य का आश्रय नहीं लेंगे । उनका यह नियम था कि जो भी याचक उनके द्वार पर आकर जो कुछ भी मांगेगा, वे उसे बिना किसी संकोच के अवश्य दान करेंगे。
राजा हरिश्चंद्र की अर्धांगिनी का नाम महारानी तारामती था, जिन्हें पौराणिक आख्यानों में 'शैव्या' के नाम से भी अत्यंत आदरपूर्वक संबोधित किया गया है । महारानी तारामती साक्षात देवी महालक्ष्मी के समान रूपवती, गुणवती, पतिव्रता और धर्मपरायण नारी थीं। वे अपने पति के सत्य-व्रत में उनकी पूर्ण सहयोगिनी थीं। उन दोनों का एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और सुलक्षणा पुत्र था, जिसका नाम रोहिताश्व था ।
राजा हरिश्चंद्र अपनी प्रजा का पालन अपने औरस पुत्र के समान ही करते थे। उनके राज्य में कभी कोई अकाल नहीं पड़ता था, कभी अतिवृष्टि या अनावृष्टि का प्रकोप नहीं होता था, और कोई भी प्रजाजन अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होता था। संपूर्ण साम्राज्य में सुख, शांति और आनंद का साम्राज्य था। परंतु विधाता की गति अत्यंत गूढ़ है। राजा हरिश्चंद्र का यही सत्य-व्रत उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति था और यही उनके जीवन की सबसे भयंकर परीक्षा का कारण भी बना。
कथा के इस चरण में पारंपरिक कथाओं के प्रमुख पात्रों की भूमिका को समझना आवश्यक है:
| पात्र का नाम | पौराणिक पहचान एवं भूमिका |
|---|---|
| राजा हरिश्चंद्र | सूर्यवंश के चक्रवर्ती सम्राट, जिनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा ली गई। |
| महारानी तारामती (शैव्या) | राजा हरिश्चंद्र की पतिव्रता पत्नी, जिन्होंने सत्य-मार्ग पर पति का पूर्ण साथ दिया। |
| राजकुमार रोहिताश्व | राजा हरिश्चंद्र के सुपुत्र, जिनकी वन में सर्पदंश से मृत्यु हुई। |
| महर्षि विश्वामित्र | परम तपस्वी ऋषि, जिन्होंने राजा के सत्य की परीक्षा हेतु माया रची। |
| महर्षि गौतम | दयालु ऋषि, जिन्होंने राजा को विपत्ति से तारने हेतु 'अजा एकादशी' का उपदेश दिया। |
| चाण्डाल | श्मशान का स्वामी (वस्तुतः धर्मराज का वेश), जिसने राजा को दास बनाया। |
ऋषि विश्वामित्र द्वारा सत्य की घोर परीक्षा का संकल्प
एक समय की बात है, स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र की सुधर्मा नामक सभा सजी हुई थी। उस दिव्य सभा में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अतिरिक्त समस्त ऋषि-मुनि, सिद्ध, गंधर्व और देवता उपस्थित थे। उस सभा में पृथ्वी लोक के धर्मनिष्ठ राजाओं की चर्चा चल रही थी। तब परम ज्ञानी महर्षि वसिष्ठ ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा, उनके दान और उनके धर्म की अत्यंत प्रशंसा की । उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में त्रिलोकी में राजा हरिश्चंद्र के समान सत्यवादी और धर्मपरायण अन्य कोई नहीं है。
परंतु परम तपस्वी और उग्र स्वभाव वाले महर्षि विश्वामित्र को यह बात स्वीकार नहीं हुई । महर्षि विश्वामित्र ने भरी देवसभा में यह प्रतिज्ञा कर ली कि वे स्वयं राजा हरिश्चंद्र के सत्य की परीक्षा लेंगे। उन्होंने कहा कि "संसार में जब तक विपत्ति नहीं आती, तब तक सभी सत्यवादी प्रतीत होते हैं। मैं यह सिद्ध कर दूंगा कि घोर संकट आने पर, अपना सर्वस्व छिन जाने पर मनुष्य अपने सत्य के मार्ग से विचलित हो ही जाता है ।" अपनी इसी कठोर प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से एक अत्यंत प्रबल माया रची。
स्वप्न-दर्शन और राज्य-त्याग का धर्मसंकट
एक रात्रि जब राजा हरिश्चंद्र अपने भव्य राजमहल में महारानी तारामती के साथ शयन कर रहे थे, तब उन्होंने एक अद्भुत और विचलित कर देने वाला स्वप्न देखा। स्वप्न में उन्होंने देखा कि एक अत्यंत तेजस्वी, कृष्ण वर्ण वाले, जटाधारी तपस्वी ब्राह्मण उनके राजदरबार में आए हैं। राजा ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक उनका सत्कार किया और दान के रूप में अपना संपूर्ण राज्य—जिसमें पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन, राजकोष और अयोध्या की संपूर्ण संपत्ति सम्मिलित है—उस तपस्वी ब्राह्मण को संकल्प-सहित दान कर दिया है。
प्रातः काल जब राजा की निद्रा टूटी, तो वे उस स्वप्न का स्मरण कर अत्यंत गंभीर विचार में पड़ गए। वे सोच रहे थे कि वह तपस्वी कौन था और इस स्वप्न का क्या अर्थ है। उसी समय, द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि परम प्रतापी महर्षि विश्वामित्र साक्षात राजद्वार पर पधारे हैं। राजा हरिश्चंद्र तुरंत नंगे पैर दौड़ते हुए राजद्वार पर गए और महर्षि को ससम्मान दरबार में लेकर आए। राजा हरिश्चंद्र ने सिंहासन से उतरकर महर्षि को साष्टांग प्रणाम किया, उनके चरण पखारे और उन्हें सर्वोच्च आसन पर विराजमान कर उनका विधिवत षोडशोपचार पूजन किया。
कुशल-क्षेम के पश्चात महर्षि विश्वामित्र ने अपनी गंभीर वाणी में राजा से कहा, "हे राजन्! क्या तुम्हें स्मरण है कि तुमने बीती रात्रि में स्वप्न में मुझे अपना संपूर्ण राज्य और यह पृथ्वी दान कर दी है? सत्यवादी होने के नाते, अब तुम्हें वह स्वप्न में किया गया दान मुझे भौतिक रूप में भी सौंपना होगा। क्या तुम अपने सत्य पर अडिग हो, या मुकर जाना चाहते हो?"
राजा हरिश्चंद्र, जो अपने सत्य से तनिक भी डिगने वाले नहीं थे, उन्होंने तनिक भी संकोच, भय या पश्चाताप के बिना महर्षि विश्वामित्र के वचनों को पूर्ण सत्य मान लिया। उन्होंने उसी क्षण अपना मणिजटित राजमुकुट उतारकर महर्षि के चरणों में रख दिया और अत्यंत विनयपूर्वक कहा, "हे मुनिवर! जो मैंने स्वप्न में दान किया है, वह पूर्णतः सत्य है। रघुकुल की यह रीति रही है कि 'प्राण जाइ पर बचन न जाई'। यह संपूर्ण पृथ्वी, यह अयोध्या का राजसिंहासन, मेरे अनंत राजकोष, मेरे अश्व-गज, और यह सारा साम्राज्य आज से आपका हुआ। मैं सहर्ष इसे आपको सौंपता हूँ। आप इस राज्य का धर्मपूर्वक पालन करें।"
परंतु महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्होंने राजा के सत्य को और अधिक कसौटी पर कसते हुए अत्यंत क्रुद्ध स्वर में कहा, "हे राजन्! तुमने मुझे संपूर्ण पृथ्वी और राज्य का दान तो कर दिया, परंतु वैदिक मर्यादा के अनुसार किसी भी महान दान के पश्चात यज्ञ को पूर्ण करने के लिए 'स्वर्ण मुद्रा' के रूप में दक्षिणा देनी अनिवार्य होती है। बिना दक्षिणा दिए तुम्हारा यह दान निष्फल हो जाएगा और तुम्हें घोर नरक की प्राप्ति होगी। अतः तुम मुझे दान की दक्षिणा के रूप में स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करो।"
राजा हरिश्चंद्र भयंकर धर्मसंकट में पड़ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "हे ऋषिवर! मैंने अपना संपूर्ण राजकोष, अपनी व्यक्तिगत संपत्ति और साम्राज्य आपको दान कर दिया है। अब इस राज्य के किसी भी धन, तिनके या स्वर्ण-कण पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। मैं अब पूर्णतः अकिंचन हूँ। आप मुझे केवल एक मास का समय दें, मैं किसी अन्य स्थान पर जाकर, अपने शरीर के परिश्रम से या किसी अन्य साधन से आपके लिए स्वर्ण मुद्राओं की व्यवस्था कर दूंगा।"
महर्षि विश्वामित्र ने राजा की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली, परंतु उन्होंने एक कठोर शर्त रखी। उन्होंने राजा को आदेश दिया कि "चूंकि तुमने संपूर्ण पृथ्वी और अयोध्या का राज्य मुझे दान कर दिया है, अतः अब तुम्हारा इस भूमि पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। तुम इसी क्षण अपने परिवार सहित मेरे राज्य की सीमा से बाहर निकल जाओ ।"
अयोध्या से प्रस्थान और प्रजा का दारुण विलाप
सत्य की रक्षा के लिए राजा हरिश्चंद्र ने बिना एक क्षण गंवाए अपने राजसी रेशमी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर दिया। उन्होंने भिक्षुकों के समान वृक्षों की छाल से बने वल्कल वस्त्र धारण किए। महारानी तारामती (शैव्या) ने भी अपने समस्त आभूषण उतार दिए, अपना राजसी शृंगार त्याग दिया और एक साधारण निर्धन स्त्री के समान वल्कल वस्त्र धारण कर अपने पति के साथ चलने को उद्यत हो गईं । राजा हरिश्चंद्र, महारानी तारामती और छोटे से सुकुमार राजकुमार रोहिताश्व ने नंगे पैर अयोध्या की उस पवित्र भूमि को त्याग दिया。
उनके जाते समय अयोध्या की प्रजा हाहाकार कर उठी। संपूर्ण नगरी में शोक की लहर दौड़ गई। आबाल-वृद्ध विलाप करते हुए राजा के पीछे-पीछे दौड़ने लगे। प्रजाजन पुकार रहे थे, "हे नाथ! हे धर्मावतार! हमें अनाथ करके आप कहाँ जा रहे हैं? आपके बिना यह अयोध्या वन के समान भयंकर हो जाएगी। हमें भी अपने साथ ले चलें।" परंतु राजा ने अत्यंत कठोरता से अपने हृदय को सत्य के मार्ग पर स्थिर रखा। उन्होंने अपनी प्रजा को सांत्वना दी, उन्हें वापस लौटाया और अत्यंत भारी हृदय से आगे बढ़ गए。
मोक्षदायिनी काशी नगरी प्रस्थान
वे तीनों पैदल चलते-चलते, कांटों और पत्थरों से भरे दुर्गम मार्गों को पार करते हुए भगवान शिव की परम पवित्र नगरी 'काशी' (वाराणसी) पहुंचे। काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी मानी जाती है और ऐसा माना जाता है कि वह सामान्य पृथ्वी के भू-भाग से पृथक है, अतः वह विश्वामित्र के दान किए गए राज्य-क्षेत्र से बाहर थी。
काशी पहुंचकर राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाने का विचार किया। एक मास की अवधि पूर्ण होने वाली थी। परंतु उनके पास कोई धन नहीं था। समय व्यतीत हो रहा था और ठीक एक मास पूर्ण होते ही महर्षि विश्वामित्र वहां काशी में भी अपनी दक्षिणा मांगने उपस्थित हो गए। उन्होंने क्रोधित होकर कहा, "हे हरिश्चंद्र! यदि आज सूर्यास्त तक तुमने मेरी दक्षिणा नहीं चुकाई, तो मैं तुम्हें भयानक श्राप दे दूंगा।"
पत्नी और पुत्र का दारुण वियोग
दक्षिणा चुकाने का कोई और मार्ग न पाकर, महारानी तारामती ने अपने पति से अत्यंत कठोर और हृदय विदारक बात कही। उन्होंने कहा, "हे प्राणनाथ! हे स्वामी! आप सत्य की रक्षा के लिए मेरा विक्रय कर दीजिए (मुझे बेच दीजिए)। मुझे किसी दास-बाज़ार में बेचकर जो धन प्राप्त हो, उससे आप महर्षि विश्वामित्र की दक्षिणा चुका दें और अपने सत्य की रक्षा करें।"
अपनी परम प्रिय, कोमल और पतिव्रता पत्नी के मुख से ऐसे दारुण वचन सुनकर राजा हरिश्चंद्र का हृदय विदीर्ण हो गया। वे फूट-फूटकर रोने लगे। जो पत्नी महलों में मखमली गद्दों पर सोती थी, उसे बाज़ार में बेचने की कल्पना मात्र से उनके प्राण सूखने लगे। परंतु सत्य के भारी ऋण और महर्षि के श्राप के भय ने उन्हें विवश कर दिया था। भारी हृदय से, अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ राजा हरिश्चंद्र काशी के दास-बाज़ार के चौराहे पर जाकर खड़े हो गए और अपनी पत्नी तथा पुत्र को बेचने के लिए कांपते हुए स्वर में पुकार लगाने लगे ।
उस समय एक वृद्ध और अत्यंत कठोर स्वभाव वाले ब्राह्मण ने महारानी तारामती को एक दासी के रूप में खरीद लिया। राजकुमार रोहिताश्व अपनी माता के बिना नहीं रह सकता था, इसलिए उस ब्राह्मण ने उस सुकुमार बालक को भी सेवक के रूप में खरीद लिया ।
जब वह ब्राह्मण तारामती को अपने साथ बलपूर्वक ले जाने लगा, तो छोटा राजकुमार रोहिताश्व अपनी माता के पल्लू को पकड़कर रोने लगा । एक क्रूर स्वामी द्वारा अपनी पत्नी और कोमल पुत्र को घसीट कर ले जाते हुए देखकर हरिश्चंद्र मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उनका हृदय फट रहा था। जब उन्हें होश आया तो वे अत्यंत विलाप करने लगे, परंतु सत्य के मार्ग से वे तनिक भी विचलित नहीं हुए । उन्होंने वह धन महर्षि को अर्पित किया。
श्मशान में दासत्व और अमानवीय कष्ट
पत्नी और पुत्र को बेचने से जो धन प्राप्त हुआ, वह महर्षि विश्वामित्र की संपूर्ण दक्षिणा के लिए अपर्याप्त था। महर्षि ने कहा, "यह धन अपर्याप्त है। मुझे मेरा शेष धन अभी चाहिए।" तब राजा हरिश्चंद्र ने विवश होकर स्वयं को भी बेचने का निर्णय लिया。
उन्होंने स्वयं को काशी के बाज़ार में खड़ा कर दिया। अंततः एक 'चाण्डाल' (श्मशान में शवदाह का कार्य करने वाला डोम) वहां आया। वह चाण्डाल अत्यंत भयानक स्वरूप वाला था। उसने राजा हरिश्चंद्र को मूल्य देकर खरीद लिया । राजा ने वह सारा धन महर्षि विश्वामित्र को सौंपकर अंततः स्वयं को दक्षिणा के ऋण से मुक्त किया और अपने सत्य की रक्षा की。
वह चाण्डाल अत्यंत कठोर था। उसने राजा हरिश्चंद्र को काशी के महाश्मशान में नियुक्त कर दिया और आदेश दिया कि उनका कार्य श्मशान में आने वाले मृतकों के शवदाह के लिए परिजनों से कर (श्मशान-शुल्क) वसूलना होगा। बिना कर चुकाए किसी भी शव का दाह-संस्कार नहीं होने दिया जाएगा ।
जो चक्रवर्ती सम्राट कभी मखमली गद्दों पर सोता था, जिसके द्वार पर राजा महाराजा नतमस्तक होते थे, वह अब श्मशान की भस्म, अस्थियों और चिताओं के धुएं के बीच रहने लगा । दिन-रात जलती चिताओं की भयंकर लपटें, मुर्दों की दुर्गंध, सियार और गिद्धों की भयानक आवाजें, और शव लेकर आने वाले शोकाकुल परिजनों का हाहाकार ही अब राजा का जीवन बन गया था। राजा हरिश्चंद्र के राजसी बाल रूखे और जटाजूट हो गए, शरीर पर चिता की राख सन गई, और हाथ में एक डंडा लेकर वे दिन-रात श्मशान की रखवाली करने लगे। वे इतने सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण थे कि चाण्डाल के आदेश का उन्होंने अक्षरशः पालन किया । किसी भी स्थिति में वे बिना कर लिए किसी शव को जलने नहीं देते थे। यह उनका अपने वर्तमान स्वामी (चाण्डाल) के प्रति धर्म था। इस प्रकार अत्यंत दारुण और अमानवीय परिस्थितियों में राजा हरिश्चंद्र ने कई वर्ष व्यतीत कर दिए ।
अत्यंत दुःख एवं महर्षि गौतम का आगमन
समय अपनी अबाध गति से चलता रहा। महारानी तारामती उस कठोर ब्राह्मण के घर में दासी का कार्य करती थीं, बर्तन मांजती थीं, झाड़ू लगाती थीं, और राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्मण के यज्ञ के लिए प्रतिदिन वन से लकड़ियाँ और फूल लाया करता था। इधर श्मशान में राजा हरिश्चंद्र अपने जीवन की दुर्दशा और पूर्व जन्म के कर्मों को याद कर अत्यंत व्याकुल और दुखी रहने लगे ।
एक दिन राजा हरिश्चंद्र श्मशान के एक कोने में बैठे हुए अत्यंत विलाप कर रहे थे। वे सोच रहे थे, "हा! मेरी यह क्या गति हो गई? मैंने किस जन्म में ऐसा कौन सा घोर पाप किया था, जिसके फलस्वरूप मुझे अपना राज्य, अपनी प्राणप्रिय पत्नी और अपने सुपुत्र से वियोग सहना पड़ रहा है? यह श्मशान की दारुण दासता मेरे जीवन से कब समाप्त होगी? क्या मेरे उद्धार का कोई मार्ग नहीं है? क्या भगवान श्रीहरि मुझ अभागे पर कभी कृपा नहीं करेंगे?"
उसी समय, दैवयोग से परम ज्ञानी, दयालु और तपस्वी महर्षि गौतम उस श्मशान के मार्ग से होकर गुज़रे । राजा हरिश्चंद्र ने जब एक तेजस्वी ऋषि को वहां देखा, तो वे तुरंत उनके श्रीचरणों में गिर पड़े। श्मशान की राख से सने एक चाण्डाल-सेवक को अपने चरणों में गिरता देख महर्षि गौतम आश्चर्यचकित रह गए। जब हरिश्चंद्र ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपना परिचय दिया और अपनी दुर्दशा, पत्नी-पुत्र के वियोग और सत्य-रक्षा की संपूर्ण कथा सुनाई, तो महर्षि गौतम का हृदय करुणा से भर आया ।
अजा एकादशी व्रत का उपदेश
महर्षि गौतम ने राजा को सांत्वना देते हुए एक अत्यंत गुप्त और परम कल्याणकारी व्रत का उपदेश दिया। महर्षि बोले,
"हे राजन्! तुम्हारी यह दुर्दशा देखकर मुझे अत्यंत दुःख हो रहा है। तुम चक्रवर्ती सम्राट हो, परंतु कर्मों की गति बड़ी गहन है। परंतु तुम निराश न हो। तुम्हारे दुखों का अंत अब निकट आ गया है।"
महर्षि ने आगे कहा, "हे राजन! आज से ठीक सात दिन पश्चात भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि आने वाली है । तीनों लोकों में यह एकादशी 'अजा एकादशी' और 'अन्नदा एकादशी' के नाम से परम विख्यात है । यह एकादशी भगवान हृषीकेश को समर्पित है और इसके प्रभाव से जन्म-जन्मांतर के बड़े से बड़े पाप, ब्रह्महत्या जैसे दोष, और सभी प्रकार के दुखों का समूल नाश हो जाता है ।
तुम इस अजा एकादशी के दिन पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण करते हुए उपवास करना। इस दिन अन्न और जल का त्याग करना, सात्विक आचरण रखना और रात्रि में जागरण करते हुए भगवान के नाम का कीर्तन करना । हे राजन्, मेरा यह वचन सत्य है कि इस अजा एकादशी के प्रभाव से तुम्हारे सभी कष्ट मिट जाएंगे, तुम्हारे पाप भस्म हो जाएंगे और तुम्हें पुनः तुम्हारा खोया हुआ वैभव प्राप्त होगा।"
ऐसा कहकर महर्षि गौतम राजा को आशीर्वाद देकर वहां से अंतर्धान हो गए ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और घोर संकट की रात्रि
महर्षि गौतम के वचनों को ब्रह्मवाक्य मानकर राजा हरिश्चंद्र ने दिन गिनने आरंभ किए। जब भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का पवित्र दिन आया, तो राजा हरिश्चंद्र ने श्मशान में रहते हुए ही अत्यंत श्रद्धा, निष्ठा और पवित्रता के साथ उस महान व्रत का पालन किया । उन्होंने दिन भर भगवान हृषीकेश का स्मरण किया और निराहार रहे। रात्रि के समय उन्होंने तनिक भी निद्रा नहीं ली और भगवान विष्णु के दिव्य नामों— "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय", "ॐ नमो नारायणाय"— का निरंतर जप करते हुए जागरण किया 。
परंतु, विधाता की लीला देखिए! सत्य की अंतिम और सबसे भयंकर परीक्षा उसी एकादशी की रात्रि में होनी थी。
उसी अजा एकादशी के दिन, जब राजकुमार रोहिताश्व अपने ब्राह्मण स्वामी के आदेश से वन में यज्ञ के लिए समिधा (लकड़ियाँ) और पुष्प लेने गया था, तो वहां एक अत्यंत विषैले काले सर्प ने उस सुकुमार बालक को डस लिया । सर्प के भयानक विष के प्रभाव से राजकुमार रोहिताश्व ने उसी क्षण वन में ही अपने प्राण त्याग दिए。
जब संध्या तक पुत्र लौटकर नहीं आया, तो महारानी तारामती व्याकुल होकर वन में उसे खोजने निकलीं। वन में एक स्थान पर उन्होंने अपने प्राणों से प्रिय पुत्र को मृत अवस्था में पड़े हुए देखा। तारामती पछाड़ खाकर गिर पड़ीं। उनका हृदय फट गया। जो बालक कभी सोने के पालने में झूलता था, वह आज वन की धूल में मृत पड़ा था। तारामती का विलाप सुनकर वन के पशु-पक्षी भी रुदन करने लगे। परंतु वह एक ब्राह्मणी की दासी थीं, उनका कोई सगा-संबंधी वहां नहीं था जो उनकी सहायता करता。
पुत्र की मृत्यु का प्रसंग और श्मशान में सत्य की कसौटी
काली अंधेरी रात, मूसलाधार वर्षा, और मेघों की भयानक गर्जना के बीच, एक अकेली असहाय माता अपने इकलौते मृत पुत्र के शव को अपनी छाती से चिपकाए, रोती-बिलखती हुई काशी के उस भयानक श्मशान में पहुंची, जहाँ राजा हरिश्चंद्र कर वसूलने का कार्य कर रहे थे ।
जब तारामती श्मशान में पहुंचीं और अपने पुत्र की चिता जलाने की तैयारी करने लगीं, तो राजा हरिश्चंद्र, जो अपने स्वामी के कर्तव्य से बंधे थे, वहां आ पहुंचे। रात्रि के गहन अंधकार और मूसलाधार वर्षा के कारण राजा अपनी पत्नी और मृत पुत्र को पहचान नहीं सके। उन्होंने अत्यंत कठोर स्वर में कहा, "हे स्त्री! श्मशान के नियम के अनुसार, बिना कर (टैक्स) चुकाए तुम इस शव का दाह-संस्कार नहीं कर सकती। पहले मुझे शवदाह का कर चुकाओ, तभी तुम इस बालक की चिता जला सकोगी ।"
तारामती ने उस चाण्डाल-सेवक की आवाज़ सुनी। वह आवाज़ पहचानी हुई थी, वह आवाज़ उनके प्राणनाथ पति की थी। तारामती रोते हुए बोलीं, "हे स्वामी! हे महाराज हरिश्चंद्र! क्या आप मुझे और अपने इस अभागे पुत्र रोहिताश्व को नहीं पहचान रहे हैं? देखिए, एक सर्प ने आपके इस कुलदीपक को डस लिया है। मैं अत्यंत अभागिन हूँ, मेरे पास इस श्मशान का कर चुकाने के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। मैं तो स्वयं एक ब्राह्मण की दासी हूँ। कृपया मुझे मेरे पुत्र का अंतिम संस्कार करने दें।"
आसमान में भयंकर बिजली चमकी। उस क्षणिक प्रकाश में राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी के आंसुओं से भीगे मुख और भूमि पर पड़े अपने मृत पुत्र रोहिताश्व के नीले पड़ चुके चेहरे को देखा। पुत्र के निर्जीव शरीर को देखकर हरिश्चंद्र के भीतर का पिता चीत्कार कर उठा। वे "हा पुत्र! हा पुत्र!" कहते हुए मूर्छित होकर गिर पड़े । कुछ समय पश्चात जब उन्हें होश आया, तो वे फूट-फूटकर रोने लगे। पति-पत्नी एक-दूसरे के गले लगकर अपने उस दारुण दुःख पर विलाप करने लगे, जिसने उनके पूरे जीवन को भस्म कर दिया था。
राजा हरिश्चंद्र के सामने अब उनके जीवन का सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा था। एक ओर उनका इकलौता मृत पुत्र और विलाप करती हुई पत्नी थी, जिसके पास कर चुकाने के लिए कुछ नहीं था; और दूसरी ओर उनके स्वामी (चाण्डाल) का आदेश और उनका अपना 'सत्य-धर्म' था । राजा हरिश्चंद्र ने अपने आंसुओं को पोंछा और अपने सत्य-धर्म को पिता के प्रेम से ऊपर रखते हुए कहा,
"हे प्रिये! मेरा हृदय इस बालक की मृत्यु पर विदीर्ण हो रहा है। परंतु मैं विवश हूँ। मैं चाण्डाल का दास हूँ। मैं अपने स्वामी के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता। बिना कर लिए मैं तुम्हें इस चिता को जलाने की अनुमति नहीं दे सकता। यदि तुम्हारे पास धन नहीं है, तो तुम अपनी उस साड़ी का आधा भाग फाड़कर मुझे दे दो, जो तुमने पहन रखी है। मैं उसी आधे वस्त्र को श्मशान का कर मानकर स्वीकार कर लूंगा ।"
दिव्य अनुग्रह, पाप-निवारण और राज्य की पुनः प्राप्ति
यह सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता की ऐसी पराकाष्ठा थी, जिसे देखकर आकाश में स्थित देवता भी कांप उठे। महारानी तारामती, जो स्वयं सत्य के मार्ग की अनुगामिनी थीं, उन्होंने अपने पति के धर्म की रक्षा के लिए तनिक भी विरोध नहीं किया। जैसे ही तारामती ने श्मशान का कर चुकाने के लिए अपनी पहनी हुई एकमात्र साड़ी (चुनरी) का आधा भाग फाड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, वैसे ही ब्रह्मांड में एक अद्भुत और अलौकिक घटना घटित हुई ।
उसी क्षण आकाश में देव-दुंदुभियां (नगाड़े) बजने लगीं। मूसलाधार वर्षा रुक गई और आकाश से सुगंधित पारिजात पुष्पों की निरंतर वर्षा होने लगी । श्मशान का वह भयानक अंधकार एक अनंत और दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हो गया。
साक्षात भगवान श्रीहरि विष्णु, ब्रह्मा जी, भगवान शिव, देवराज इंद्र, धर्मराज (यमराज), और महर्षि विश्वामित्र वहां प्रकट हो गए । भगवान नारायण के मुखमंडल पर एक अत्यंत मधुर मुस्कान थी। भगवान विष्णु ने अपने श्रीमुख से कहा:
"धन्य हो राजन्! धन्य हो! तुमने सत्य की जो परीक्षा दी है, वह तीनों लोकों में अकल्पनीय है। तुमने अपने सत्य से तनिक भी विचलित न होकर सारे संताप झेले हैं । युगों-युगों तक यह संसार तुम्हारी सत्यनिष्ठा को याद रखेगा। महर्षि विश्वामित्र द्वारा रची गई यह सारी माया केवल तुम्हारे सत्य को तीनों लोकों में स्थापित करने के लिए थी । वह चाण्डाल कोई और नहीं, साक्षात धर्मराज थे, जिन्होंने तुम्हारे धर्म की परीक्षा लेने के लिए वह रूप धारण किया था। तुम्हारी यह महान विजय तुम्हारे सत्य और इस पावन 'अजा एकादशी' के व्रत के पुण्य प्रभाव से हुई है ।"
उसी समय देवराज इंद्र और भगवान विष्णु की असीम कृपा से मृत राजकुमार रोहिताश्व जीवित होकर उठ खड़ा हुआ । मानो वह किसी गहरी निद्रा से जागा हो। महारानी तारामती को भी अजा एकादशी के प्रभाव से दिव्य और राजसी वस्त्र तथा आभूषण प्राप्त हो गए । अजा एकादशी के व्रत ने उनके पूर्व जन्म के उन समस्त पापों का निवारण कर दिया था, जिसके कारण उन्हें यह अमानवीय कष्ट भोगना पड़ा था。
महर्षि विश्वामित्र ने आगे बढ़कर राजा हरिश्चंद्र को हृदय से लगा लिया और कहा, "हे राजन्! तुमने मेरे द्वारा दी गई कठोर से कठोर पीड़ा को सहा, परंतु धर्म नहीं छोड़ा। मैं तुम्हारे सत्य के समक्ष नतमस्तक हूँ। मैं तुम्हारा संपूर्ण राज्य, तुम्हारी अयोध्या तुम्हें ससम्मान वापस लौटाता हूँ ।"
भगवान विष्णु और देवताओं के आशीर्वाद से राजा हरिश्चंद्र, महारानी तारामती और राजकुमार रोहिताश्व पुनः अपने पूर्ण वैभव के साथ अयोध्या लौट आए । अयोध्या की प्रजा ने अपने प्रिय राजा का अत्यंत भव्य स्वागत किया। राजा हरिश्चंद्र ने कई वर्षों तक अयोध्या पर अत्यंत धर्मपूर्वक राज्य किया। उनके राज्य में सर्वत्र सुख, शांति और धर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया。
अंत समय में, जब राजा हरिश्चंद्र के महाप्रयाण का समय आया, तो अजा एकादशी के पुण्य प्रभाव और अपनी सत्यनिष्ठा के कारण, राजा हरिश्चंद्र ने अपने पुत्र रोहिताश्व को अयोध्या का राज्य सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी तारामती तथा अपनी अयोध्या की संपूर्ण प्रजा के साथ सदेह भगवान श्रीहरि के परम धाम (वैकुंठ लोक) को प्रस्थान कर गए ।
द्वितीय पारंपरिक पाठ: भविष्य पुराण के अनुसार अजा एकादशी का प्रसंग
(शास्त्रों में एकादशी व्रतों की महिमा अनंत है। पारंपरिक ग्रंथों और भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में भी 'अजा एकादशी' से संबंधित एक अत्यंत प्राचीन और भिन्न कथा का उल्लेख प्राप्त होता है। प्रमाण के आधार पर इस संस्करण का वर्णन भी प्रस्तुत है, जो अजा एकादशी की महिमा को और अधिक स्पष्ट करता है।)
भविष्य पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं: "पूर्वमासीत्कृतयुगे क्षत्रिणी बहुपुत्रिणी। नाम्ना कलिंगभद्रेति रूपलावण्यसंयुता॥"
प्राचीन काल में, कृतयुग (सतयुग) में राजा दिलीप की एक परम रूपवती, सौभाग्यशालिनी और अत्यंत गुणवती पत्नी थी, जिसका नाम कलिंगभद्रा था। वह महारानी अनेक पुत्रों की माता थी और अपने पति राजा दिलीप के साथ अत्यंत सुखपूर्वक राज्य का उपभोग करती थी। वह महासती ब्राह्मणों को प्रचुर दान देती थी और धर्म-कर्म में अग्रणी थी。
एक बार कार्तिक मास में महारानी कलिंगभद्रा ने एक पवित्र व्रत धारण किया। परंतु उस व्रत की पूर्णता (उद्यापन) से पूर्व ही, एक अर्धरात्रि में जब वह अपने पति के साथ शयन कर रही थी, तब एक भयंकर सर्प ने उसे डस लिया और क्षण भर में ही उसकी मृत्यु हो गई ।
व्रत के अपूर्ण रह जाने और सर्पदंश के दोष के कारण, वह सुंदरी महारानी कलिंगभद्रा अगले जन्म में 'अजा' (बकरी) की योनि में उत्पन्न हुई । बकरी के रूप में जन्म लेने पर भी, अपने पूर्व जन्म के धर्म-कर्म के प्रभाव से उसे 'जाति-स्मरण' (पूर्व जन्म की स्मृति) बना रहा। वह अजा (बकरी) धर्मपरायण थी और वनों में विचरण करते हुए भी अपने पूर्व जन्म के 'कृत्तिका व्रत' का मानसिक रूप से पालन करती थी ।
एक बार कार्तिक मास में, एक वनवासी ने उस बकरी को पकड़ लिया और उसे एक बेर के वृक्ष से बांध दिया। दैवयोग से परम तपस्वी महर्षि अत्रि वहां पधारे। उन्होंने अपने योगबल से उस अजा (बकरी) के पूर्व जन्म को जान लिया कि यह राजा दिलीप की महारानी कलिंगभद्रा है । महर्षि अत्रि ने उसे मुक्त कराया। उस अजा ने बेर के पत्ते खाकर और पुष्करिणी का जल पीकर अपने व्रत का पारण किया。
महर्षि अत्रि ने उसे योग-दीक्षा दी। तब उस अजा ने योग के प्रभाव से अपना शरीर त्याग दिया और महर्षि गौतम की पुत्री 'अहल्या' के गर्भ से एक अत्यंत सुंदरी कन्या के रूप में जन्म लिया । उस कन्या का नाम 'योगलक्ष्मी' रखा गया। वह साक्षात देवी सरस्वती और महालक्ष्मी के समान गुणवती थी। महर्षि गौतम ने अपनी उस कन्या का विवाह महर्षि शांडिल्य के साथ कर दिया ।
जब महर्षि अत्रि ने पुनः योगलक्ष्मी को देखा, तो उन्होंने उसे उसके पूर्व जन्मों का स्मरण कराया और उस पुण्यदायिनी 'एकादशी' का व्रत और मंत्र प्रदान किया, जिसके प्रभाव से योगलक्ष्मी ने इस लोक में चिरकाल तक सुख, पुत्र और पौत्रों का आनंद भोगा और अंत में भगवान विष्णु के उस परम पद को प्राप्त किया, जहाँ से कभी पुनरावृत्ति नहीं होती (मोक्ष प्राप्त किया) ।
(यह आख्यान सिद्ध करता है कि भूलवश भी यदि व्रत खंडित हो जाए, तो भगवान श्रीहरि की शरण में जाकर एकादशी का पालन करने से जीव निम्न योनियों से भी मुक्त होकर परम मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।)
पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजा हरिश्चंद्र की कथा को पूर्ण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं:
"हे युधिष्ठिर! यह सब उस परम पवित्र 'अजा एकादशी' (अन्नदा एकादशी) के व्रत का ही साक्षात प्रभाव था, जिसने राजा हरिश्चंद्र के समस्त दुखों का नाश कर दिया और उन्हें उनका राज्य, पत्नी और मृत पुत्र पुनः लौटा दिया । यह व्रत महान से महान विपत्ति को हरने वाला और पूर्व जन्म के घोर से घोर पापों को भस्म करने वाला है ।
जो भी मनुष्य इस अजा एकादशी के दिन पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और विधि-विधान से भगवान हृषीकेश का पूजन करता है, निराहार रहकर इस व्रत का पालन करता है और रात्रि में भगवान के निमित्त जागरण करता है, उसके समस्त पाप निश्चित रूप से नष्ट हो जाते हैं। वह इस लोक में सुख, समृद्धि और आरोग्य प्राप्त कर अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त होता है ।
हे राजन्! जो मनुष्य इस व्रत को करने में असमर्थ भी हो, परंतु यदि वह इस अजा एकादशी के दिन राजा हरिश्चंद्र की इस परम पवित्र और सत्य से परिपूर्ण 'व्रत कथा' का केवल श्रवण करता है अथवा इसे पढ़ता है, तो केवल इस कथा के श्रवण मात्र से उसे महान 'अश्वमेध यज्ञ' करने का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है ।
शास्त्रों में यह पारंपरिक फल-वचन उद्घोषित है: "स्वर्गं लेभे हरिश्चन्द्रः सभार्यः सपुत्रकः। इदं व्रतं राजन् ये कुर्वन्ति च मानवाः॥ सर्वपापमुक्ता स्वर्गयानं पठनादपि अश्वमेधफलं लभेत्।"
(अर्थात: जिस प्रकार राजा हरिश्चंद्र अपनी पत्नी और पुत्र सहित स्वर्ग को प्राप्त हुए, उसी प्रकार हे राजन, जो भी मनुष्य इस अजा एकादशी का व्रत करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को जाते हैं। और जो श्रद्धापूर्वक इस आख्यान को केवल पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें भी निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है।)
अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने कल्याण, पापों की निवृत्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस पावन अजा एकादशी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए और इस पवित्र कथा का श्रवण करना चाहिए।"
बोलिए भगवान श्रीहरि विष्णु (हृषीकेश) की जय!
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की जय!
अजा एकादशी माता की जय!