विस्तृत उत्तर
सत्यनारायण पूजा पद्धति का मुख्य स्रोत 'स्कंद पुराण' का 'रेवा खंड' माना जाता है, जहाँ नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक ऋषि और सूत जी के बीच संवाद होता है और सूत जी नारद-विष्णु संवाद के माध्यम से इस व्रत का विधान बताते हैं। इसके अलावा 'भविष्य पुराण' के 'प्रतिसर्ग पर्व' में भी इसका उल्लेख है। यद्यपि कुछ विद्वान (जैसे आर.सी. हाजरा) इसे बाद में जोड़ा गया 'क्षेपक' (Interpolation) मानते हैं और 19वीं सदी की शारदा पांडुलिपियों में भी इसका प्रमाण मिलता है, परंतु धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे निबन्ध ग्रंथों द्वारा मान्यता दिए जाने के बाद, यह व्रत 'स्मार्त' परंपरा और शास्त्रों का पूर्णतः अभिन्न अंग बन चुका है।





