विस्तृत उत्तर
स्कन्द पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जिसके हृदय में 'नमः शिवाय' मंत्र निवास करता है, उसे अन्य बहुत से मंत्रों, तीर्थों, तपस्याओं अथवा यज्ञों की क्या आवश्यकता है?
स्कंद पुराण में नमः शिवाय के बारे में क्या कहा गया है को संदर्भ सहित समझें
स्कंद पुराण में नमः शिवाय के बारे में क्या कहा गया है का सबसे सीधा सार यह है: स्कंद पुराण कहता है: जिसके हृदय में 'नमः शिवाय' मंत्र निवास करता है, उसे अन्य मंत्रों, तीर्थों, तपस्याओं या यज्ञों की कोई आवश्यकता नहीं।
नमः शिवाय मंत्र परिचय जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।
नमः शिवाय मंत्र परिचय श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।
यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।
इसी विषय के 5 प्रश्न
विषय की गहराई समझने के लिए इन संबंधित प्रश्नों को भी पढ़ें
नमः शिवाय को 'पंचाक्षर मंत्र' क्यों कहते हैं?
'नमः शिवाय' को पंचाक्षर मंत्र इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें पाँच अक्षर (न, म, शि, वा, य) हैं — ॐ जोड़ने पर यह 'षडाक्षर मंत्र' बनता है।
नमः शिवाय मंत्र क्या है?
नमः शिवाय भगवान शिव का आदिमंत्र है — यह केवल पाँच अक्षर नहीं बल्कि स्वयं शिव का शब्द-स्वरूप और साक्षात् नाद-विग्रह है। शिव महापुराण के अनुसार इसकी महिमा सौ करोड़ वर्षों में भी नहीं कही जा सकती।
नमः शिवाय को 'वेदों का सारतत्व' क्यों कहते हैं?
नमः शिवाय को वेदों का सारतत्व इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कृष्ण और शुक्ल यजुर्वेद दोनों में विद्यमान है — यह अनादि वैदिक ज्ञान का हृदय और लौकिक-पारलौकिक सुख देने वाला मंत्रराज है।
नमः शिवाय मंत्र की प्रामाणिकता कहाँ से है?
नमः शिवाय की प्रामाणिकता वेदों में है — कृष्ण यजुर्वेद की 'श्री रुद्रम् चमकम्' और शुक्ल यजुर्वेद की 'रुद्राष्टाध्यायी' में यह अनादि काल से विद्यमान है।
नमः शिवाय मंत्र की महिमा क्या है?
शिव महापुराण: इसकी महिमा सौ करोड़ वर्षों में नहीं कही जा सकती। स्कंद पुराण: जिसके हृदय में यह मंत्र है उसे तीर्थ, तपस्या, यज्ञ की आवश्यकता नहीं। यह वेदों का सारतत्व और मोक्षदायक है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





