विस्तृत उत्तर
इस महामंत्र की प्रामाणिकता और महिमा स्वयं श्रुतियों (वेदों) में स्थापित है। यह कोई लौकिक रचना नहीं, अपितु अनादि वैदिक ज्ञान का हृदय है।
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता के अंतर्गत 'श्री रुद्रम् चमकम्' में तथा शुक्ल यजुर्वेद की 'रुद्राष्टाध्यायी' में यह मंत्र प्रकट हुआ है।
वेदों के हृदय में स्थित होने के कारण ही इसे 'वेदों का सारतत्व' कहा गया है।
यह मंत्रराज समस्त वेदों का सारतत्व है और साधक को लौकिक एवं पारलौकिक सुख प्रदान कर अंत में मोक्ष की ओर ले जाता है।





