श्री लक्ष्मी चालीसा: ऐतिहासिक उद्गम, साहित्यिक संरचना, रचयिता मीमांसा एवं उपासना पद्धति का विस्तृत शोध प्रतिवेदन
2. श्री लक्ष्मी चालीसा: संपूर्ण मूल पाठ
।। दोहा ।। मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, परुवहु मेरी आस।। ।। सोरठा ।। यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूँ। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका।। ।। चौपाई ।। सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही। ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही॥ तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥ जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥ तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥ जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥ विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥ केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥ कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जग जननि विनती सुन मोरी॥ ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥ क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥ चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥ जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥ स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥ तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥ अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥ तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥ मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥ तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥ और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥ ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥ त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥ जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥ ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥ पुत्रहीन अरु सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥ विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥ पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥ सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥ बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥ प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥ बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥ करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥ जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥ तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥ मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥ भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥ बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥ नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥ रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥ केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥ ।। दोहा ।। त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥ रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
2.1 फलश्रुति
चालीसा के अंतिम भाग में 'फलश्रुति' है, जो बताती है कि पाठ का क्या लाभ है।
- पुत्रहीन अरु सम्पत्ति हीना: यह पंक्ति बताती है कि चालीसा का पाठ केवल धन ही नहीं, बल्कि वंश वृद्धि (पुत्र प्राप्ति) के लिए भी किया जाता है।
- अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना: यह स्वास्थ्य लाभ और शारीरिक व्याधियों के नाश का आश्वासन देती है।
- शत्रु नाश: अंतिम दोहे में "करो शत्रु का नाश" का उल्लेख है, जो दर्शाता है कि लक्ष्मी का उग्र रूप (दुर्गा/चंडी) भी इसमें समाहित है, जो भक्त की रक्षा करता है।
3. रचयिता मीमांसा: कौन हैं कवि 'रामदास'?
श्री लक्ष्मी चालीसा के अंतिम दोहे में कवि की छाप मिलती है: "रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।" भारतीय साहित्य के इतिहास में 'रामदास' नाम अत्यंत सामान्य रहा है, जिसके कारण इस रचना के वास्तविक रचयिता की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद और भ्रांतियां हैं। शोध और विश्लेषण के आधार पर तीन प्रमुख संभावनाएं उभर कर आती हैं।
3.1 परिकल्पना 1: समर्थ रामदास (17वीं शताब्दी)
जनमानस में एक प्रचलित धारणा यह है कि इसके रचयिता समर्थ रामदास (1608–1682) हैं, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु थे।
- पक्ष में तर्क: समर्थ रामदास हनुमान और राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने दासबोध और मनाचे श्लोक जैसी रचनाएं कीं। भक्ति परंपरा में उनका नाम अत्यंत आदरणीय है।
- विरोध में साक्ष्य: भाषाई विश्लेषण इस परिकल्पना का खंडन करता है। समर्थ रामदास की मूल रचनाएं मराठी भाषा में हैं। यद्यपि उन्होंने दक्खिनी हिंदी का प्रयोग किया है, परन्तु लक्ष्मी चालीसा की भाषा 'खड़ी बोली' हिंदी है, जिसका व्याकरण और शब्दावली 19वीं सदी के अंत की प्रतीत होती है। 17वीं सदी की हिंदी (अवधी/ब्रज) की संरचना इससे भिन्न थी। साथ ही, समर्थ रामदास के साहित्य में 'चालीसा' शैली (40 चौपाइयों का स्तोत्र) का प्रमाण नहीं मिलता, जो कि मुख्य रूप से तुलसीदास (हनुमान चालीसा) के बाद विकसित हुई विधा है।
3.2 परिकल्पना 2: आधुनिक युगीन संत 'रामदास'
विद्वानों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि लक्ष्मी चालीसा के रचयिता 19वीं या 20वीं शताब्दी के कोई अन्य संत हैं, जिनका नाम या उपनाम 'रामदास' था।
- साक्ष्य: गीताप्रेस गोरखपुर और अन्य प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित चालीसा संग्रहों में अक्सर रचयिता का नाम 'रामदास' मिलता है, लेकिन कोई ऐतिहासिक परिचय नहीं दिया जाता। कई स्रोतों में सुंदरदास या अन्य संतों का नाम भी आता है, लेकिन 'रामदास' नाम ही पाठ में अंकित है।
- निष्कर्ष: यह अत्यधिक संभव है कि यह रचना 1850-1920 के बीच रची गई, जब प्रिंटिंग प्रेस (मुद्रण) के आगमन से सरल हिंदी साहित्य की मांग बढ़ी। इस काल के किसी भक्त कवि ने अपना नाम 'रामदास' (राम का दास) रखकर इस लोकप्रिय चालीसा की रचना की।
3.3 परिकल्पना 3: 'रामदास' एक विनम्र उपनाम
भक्ति काल में कवियों द्वारा स्वयं को भगवान का 'दास' कहने की परंपरा रही है (जैसे सूरदास, तुलसीदास)। संभव है कि रचयिता ने अपना वास्तविक लौकिक नाम छिपाकर स्वयं को केवल "रामदास" (ईश्वर का सेवक) के रूप में प्रस्तुत किया हो। यह विनम्रता वैष्णव संतों की विशेषता रही है।
4. उद्गम और रचना काल
4.1 चालीसा साहित्य का उद्भव
'चालीसा' विधा का उद्गम गोस्वामी तुलसीदास कृत 'हनुमान चालीसा' (16वीं शताब्दी) से माना जाता है। तुलसीदास ने संस्कृत के क्लिष्ट स्तोत्रों के स्थान पर जनभाषा अवधी में 40 चौपाइयों का विधान बनाया। यह शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि कालांतर में हर प्रमुख देवता (शिव, दुर्गा, गणेश, लक्ष्मी) के लिए चालीसाएं लिखी गईं।
4.2 लक्ष्मी चालीसा का काल निर्धारण
लक्ष्मी चालीसा की भाषा का विश्लेषण करने पर हमें इसके रचना काल के संकेत मिलते हैं:
- भाषा: इसकी भाषा खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रज और अवधी का मिश्रण है, लेकिन व्याकरण आधुनिक हिंदी के निकट है।
- शब्दावली: इसमें 'दिल', 'हाल', 'अरदास' जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है। यद्यपि ये शब्द मध्यकाल में आ चुके थे, लेकिन जिस सहजता से इनका प्रयोग खड़ी बोली के प्रवाह में किया गया है, वह भारतेन्दु युग (1850-1900) या उसके बाद के समय की ओर संकेत करता है।
- मुद्रण संस्कृति: लक्ष्मी चालीसा की लोकप्रियता 20वीं सदी में गीताप्रेस और अन्य धार्मिक पत्रिकाओं के प्रसार के साथ चरम पर पहुंची। अतः इसका उद्गम 19वीं शताब्दी का उत्तरार्ध मानना ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त है।






