विस्तृत उत्तर
देव्युपनिषद् (देवी अथर्वशीर्ष) के २८वें श्लोक में देवी की स्तुति करते हुए स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है:
यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता। तां दुर्गा दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम्। नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥
इसका अभिप्राय यह है कि सम्पूर्ण अस्तित्व में जिनसे श्रेष्ठ या परे अन्य कोई सत्ता नहीं है, उन्हें ही 'दुर्गा' के नाम से जाना जाता है। वे दुराचार (पाप) का विनाश करने वाली हैं और संसार रूपी भवसागर से पार उतारने वाली हैं।





