विस्तृत उत्तर
वैष्णव पंजर गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड (आचारखण्ड) में वर्णित एक महत्त्वपूर्ण उपासना-विधि है। गरुड़ पुराण विकिपीडिया के विवरण के अनुसार इस खण्ड में श्राद्ध पूजा की विधि, नवव्यूह की पूजाविधि, वैष्णव-पंजर, योगाध्याय और विष्णुसहस्रनाम कीर्तन जैसे विषयों का क्रमिक वर्णन है।
पंजर' का शाब्दिक अर्थ है — पिंजरा, ढाँचा या कवच। वैष्णव पंजर एक प्रकार का रक्षा-कवच (kavach) है जो भगवान विष्णु के नामों, रूपों और शक्तियों के माध्यम से साधक के शरीर के प्रत्येक अंग की सुरक्षा करता है। यह 'विष्णु पंजर स्तोत्र' के रूप में भी जाना जाता है।
भारतकोश के अनुसार गरुड़ पुराण में 'गारूड़ी विद्या मन्त्र' और 'विष्णु पंजर स्तोत्र' दोनों का वर्णन मिलता है। इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध है — जिस प्रकार गारूड़ी विद्या सर्पविष से रक्षा करती है, उसी प्रकार विष्णु पंजर समस्त भयों और आसुरी शक्तियों से रक्षा का कवच है।
वैष्णव पंजर की उपासना में साधक भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों का आवाहन करके उन्हें शरीर के विभिन्न अंगों में स्थापित करता है — यह न्यास विधि है। इससे साधक का सम्पूर्ण शरीर भगवान की शक्ति से आच्छादित हो जाता है। यह विधि तांत्रिक-वैष्णव परम्परा में उपासकों की रक्षा और सिद्धि के लिए प्रयुक्त होती है।
वैष्णव पंजर का पाठ गरुड़ पुराण पर आधारित वैष्णव उपासना में, विशेषकर यात्रा, व्याधि और संकट के समय, किया जाता है।




