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शास्त्र ज्ञान📜 श्वेताश्वतर उपनिषद 6/23, मुण्डकोपनिषद 3/1/5, कठोपनिषद 2/23, ईशावास्योपनिषद 1, बृहदारण्यक 4/4/222 मिनट पठन

उपनिषद में भक्ति का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

श्वेताश्वतर उपनिषद (6/23) में 'यस्य देवे परा भक्तिः' — ईश्वर और गुरु में परम भक्ति हो तो ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है। मुण्डकोपनिषद (3/1/5) में आत्मा उसी के लिए प्रकट होती है जिसे वह चुनती है — यह चुनाव भक्ति और प्रेम पर आधारित है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में भक्ति का महत्व

उपनिषदों में भक्ति की स्थिति

उपनिषद मुख्यतः ज्ञान-मार्गी हैं, किंतु कुछ उपनिषदों — विशेषतः श्वेताश्वतर — में भक्ति को ज्ञान और योग के समकक्ष या उससे ऊपर रखा गया है।

श्वेताश्वतर उपनिषद (6/23) — भक्ति का महान वचन

*'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।'*

— जिस महात्मा की परमात्मा में परम भक्ति हो और गुरु में उसी के समान भक्ति हो — उसके लिए ही ये उपनिषद-वाक्य प्रकाशित होते हैं।

यह वचन भक्ति को ज्ञान-प्राप्ति की पूर्व-शर्त बताता है।

मुण्डकोपनिषद (3/1/5) — प्रेम से ब्रह्म मिलता है

*'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।'*

— आत्मा उसी के लिए अपने को प्रकट करती है जिसे वह चुनती है। यह 'चुनाव' भक्ति और प्रेम की तीव्रता पर आधारित है।

कठोपनिषद (2/23)

*'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।'*

— आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न बहुत श्रवण से — वह उसी को मिलती है जिसे वह वरण करे। यह 'वरण' भक्त के प्रेम का उत्तर है।

उपनिषद-भक्ति के रूप

  • उपासना — देवमूर्ति या ब्रह्म के गुणों का ध्यान
  • नाम-जप — ब्रह्म के नाम का निरंतर स्मरण (ॐ, सोऽहम्)
  • श्रद्धा — गुरु और शास्त्र में अटूट विश्वास
  • सम्पूर्ण समर्पण — 'आत्म-निवेदन' — ईश्वर को सब कुछ अर्पण

निष्कर्ष: उपनिषदों में ज्ञान और भक्ति का विरोध नहीं — भक्ति ज्ञान की भूमिका तैयार करती है और ज्ञान भक्ति को पूर्ण करता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्वेताश्वतर उपनिषद 6/23, मुण्डकोपनिषद 3/1/5, कठोपनिषद 2/23, ईशावास्योपनिषद 1, बृहदारण्यक 4/4/22
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उपनिषद में भक्ति का महत्व क्या है — शास्त्रों के अनुसार

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