विस्तृत उत्तर
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न है। शास्त्रों और आचार्यों ने इसका गहन उत्तर दिया है।
मूर्ति पूजा क्यों आवश्यक (शास्त्रीय तर्क)
- 1निर्गुण ब्रह्म का ध्यान कठिन — गीता (12.5):
*'क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्'*
— निराकार (अव्यक्त) पर मन लगाना अत्यंत कठिन है। सामान्य मनुष्य को ध्यान के लिए एक केंद्र बिंदु (focal point) चाहिए — मूर्ति वही केंद्र है।
- 1प्रतीक (Symbol) — जैसे राष्ट्रध्वज कपड़े का टुकड़ा है पर उसमें हम राष्ट्र देखते हैं, जैसे फोटो में हम अपने प्रियजन को देखते हैं — वैसे ही मूर्ति में भक्त ईश्वर को देखता है। मूर्ति प्रतीक है, ईश्वर नहीं; पर प्रतीक के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचते हैं।
- 1भगवान स्वयं सभी रूपों में — गीता (4.11):
*'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'*
— जो जिस रूप में मुझे भजता है, मैं उसी रूप में उसे स्वीकार करता हूँ।
- 1आगम शास्त्र — मंदिर और मूर्ति पूजा का विधान आगम शास्त्रों में विस्तार से है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति में दिव्य ऊर्जा का आवाहन किया जाता है।
- 1भक्ति का सहज मार्ग — मूर्ति पूजा सभी के लिए सुलभ है — बच्चे, बूढ़े, अशिक्षित सभी मूर्ति के सामने प्रेम और श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं।
- 1रामानुज का दृष्टिकोण — ईश्वर अपनी करुणा से भक्तों के लिए मूर्ति/अर्चा रूप में प्रकट होता है — यह उसकी दया है कि वह अपने आप को सीमित रूप में प्रस्तुत करता है ताकि भक्त उस तक पहुँच सके।
सारांश: ईश्वर सब जगह है — यह सत्य है। मूर्ति पूजा इसके विरुद्ध नहीं बल्कि सहायक है। मूर्ति = ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ी। जब साधक उन्नत होता है, वह मूर्ति से परे निराकार ब्रह्म तक पहुँचता है।





