विस्तृत उत्तर
यह एक विवादित और बहुचर्चित प्रश्न है। सत्य यह है कि दोनों पक्षों में कुछ सच्चाई है।
वेदों में मूर्ति पूजा
- ▸वेदों (विशेषतः ऋग्वेद) में मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष और विस्तृत विधान नहीं मिलता। वेदों में प्रमुख पूजा विधि यज्ञ (हवन) है — अग्नि के माध्यम से देवताओं को आहुति।
- ▸वैदिक काल की पूजा मुख्यतः यज्ञ, मंत्र जप, स्तोत्र पाठ पर आधारित थी।
- ▸हालाँकि ऋग्वेद में कुछ सूक्तों में देवताओं के भौतिक स्वरूप का वर्णन है (इंद्र का वज्र, विष्णु के पद आदि) जो मूर्ति निर्माण की प्रेरणा हो सकते हैं।
मूर्ति पूजा का विकास
- ▸उत्तर वैदिक काल/गृहसूत्र काल में मूर्ति पूजा के संकेत मिलने लगते हैं।
- ▸आगम शास्त्र (शैव आगम, वैष्णव पंचरात्र, शाक्त तंत्र) — मूर्ति पूजा, मंदिर निर्माण और प्रतिमा विज्ञान का विस्तृत विधान।
- ▸शिल्पशास्त्र (मयमतम्, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश) — मूर्ति निर्माण की विस्तृत तकनीक।
- ▸पुराण काल — मूर्ति पूजा पूर्णतः प्रचलित और स्थापित।
संतुलित दृष्टिकोण
- ▸मूर्ति पूजा वेदों के विरुद्ध नहीं है — यह वैदिक ज्ञान का विस्तार और लोक-अनुकूलन है।
- ▸वेदों में ईश्वर सर्वव्यापक और निराकार है — मूर्ति पूजा उसी निराकार ईश्वर तक पहुँचने का साकार मार्ग है।
- ▸समय के साथ भक्ति आंदोलन ने मूर्ति पूजा को और व्यापक बनाया।
ध्यान दें: यह विषय शैक्षणिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से संवेदनशील है। आर्य समाज जैसे सम्प्रदाय मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं, जबकि अधिकांश सनातनी परंपराएँ इसे मान्य और शास्त्रसम्मत मानती हैं।





