विस्तृत उत्तर
यह हिंदू दर्शन का एक गहन प्रश्न है। संक्षिप्त उत्तर: ईश्वर एक ही है, पर उसके रूप अनेक हैं।
वैदिक प्रमाण
ऋग्वेद (1.164.46): *'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'*
— सत्य (ईश्वर) एक ही है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
यह वेदों का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है — अग्नि, इंद्र, वरुण, यम आदि सब एक ही परम सत्ता के विभिन्न नाम और रूप हैं।
उपनिषद दृष्टिकोण
- ▸श्वेताश्वतर उपनिषद (6.11): *'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः'* — एक ही देव सभी प्राणियों में छिपा है।
- ▸छांदोग्य उपनिषद: *'एकमेवाद्वितीयम्'* — वह (ब्रह्म) एक ही है, उसके समान दूसरा कोई नहीं।
भगवद्गीता (7.21)
*'यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति'*
— जो भक्त जिस रूप में ईश्वर की पूजा करना चाहता है, मैं (कृष्ण) उसकी श्रद्धा उसी रूप में दृढ़ करता हूँ।
विभिन्न स्तर
- 1निर्गुण ब्रह्म (अद्वैत) — एक, निराकार, सर्वव्यापक परम सत्ता। यह परम सत्य है।
- 2सगुण ईश्वर — ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवी आदि — निर्गुण ब्रह्म के सगुण रूप।
- 3देवता — इंद्र, अग्नि, वरुण आदि — प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के अधिष्ठाता।
सारांश: हिंदू धर्म न तो शुद्ध एकेश्वरवाद (Monotheism) है, न बहुदेववाद (Polytheism) — यह 'हेनोथीज़्म' (Henotheism) या अद्वैत दृष्टि से एकत्ववाद (Monism) है: एक परम सत्ता अनेक रूपों में प्रकट होती है। अनेक देवता उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्तियाँ हैं।





