विस्तृत उत्तर
## हिंदू धर्म में भक्ति क्या है?
भक्ति की परिभाषा
नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है — *'सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा'* — ईश्वर के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है। भक्ति में ज्ञान और वैराग्य स्वयं समाहित हो जाते हैं।
नवधा भक्ति (भागवत 7/5/23-24) — प्रह्लाद-उपदेश
- 1श्रवण — भगवान की कथा-लीला का श्रवण
- 2कीर्तन — भगवान के नाम-गुण का संकीर्तन
- 3स्मरण — निरंतर भगवान का स्मरण
- 4पाद-सेवन — भगवान के चरणों की सेवा
- 5अर्चन — मूर्ति-पूजा और उपासना
- 6वंदन — साष्टांग प्रणाम
- 7दास्य — भगवान का दास भाव
- 8सख्य — मित्र भाव से ईश्वर का स्मरण
- 9आत्म-निवेदन — सम्पूर्ण समर्पण
गीता में भक्ति (अध्याय 9/26)
*'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।'*
— जो भक्त श्रद्धापूर्वक पत्र, पुष्प, फल या जल भेंट करता है, उसे भगवान स्वीकार करते हैं।
भक्ति के भेद
- ▸सकाम भक्ति — किसी फल की इच्छा से की गई उपासना
- ▸निष्काम भक्ति — केवल प्रेम के लिए, बिना किसी अपेक्षा के
- ▸परा भक्ति — जिसमें भक्त ईश्वर में लीन हो जाता है (सर्वोच्च)
भक्ति का महत्व
गीता (18/54-55) के अनुसार परा भक्ति द्वारा ही भगवान को तत्त्व से जाना जा सकता है और उनमें प्रवेश पाया जा सकता है। नारद, मीरा, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु — भक्ति के महान आदर्श हैं।





