विस्तृत उत्तर
मृत्युंजय और महामृत्युंजय — दोनों भगवान शिव (रुद्र/त्र्यम्बक) को संबोधित हैं, परंतु रूप भिन्न:
मृत्युंजय मंत्र (मूल/लघु)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥'
यह ऋग्वेद (7.59.12) का मूल श्लोक है। ऋषि: वसिष्ठ। छंद: अनुष्टुप। इसे त्रयम्बकम मंत्र भी कहते हैं। यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता 1.8.6) में भी।
महामृत्युंजय मंत्र (बीज सहित/पूर्ण)
'ॐ हौं जूं सः
ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ
सः जूं हौं ॐ'
यह मूल मंत्र + बीज मंत्र (हौं, जूं, सः) + व्याहृति (भूर्भुवः स्वः) = पूर्ण महामृत्युंजय। 'महा' = अधिक शक्तिशाली।
अंतर सार
- ▸मूल त्रयम्बकम् = ऋग्वेद श्लोक — सभी जप सकते हैं, बिना दीक्षा।
- ▸बीज सहित महामृत्युंजय = तांत्रिक विस्तार — अधिक शक्तिशाली, गुरु दीक्षा श्रेष्ठ।
- ▸दोनों के मूल श्लोक एक ही हैं।
- ▸अनेक नाम: त्रयम्बकम, रुद्र मंत्र, मृत-संजीवनी मंत्र।
33 अक्षर = 33 देवता (8 वसु + 11 रुद्र + 12 आदित्य + 1 प्रजापति + 1 षटकार)।
मार्कंडेय ऋषि: इस मंत्र से मृत्यु पर विजय प्राप्त की।





