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शिव मंत्र📜 ऋग्वेद (7.59.12), यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता 1.8.6), शिव पुराण2 मिनट पठन

मृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र में क्या अंतर है?

संक्षिप्त उत्तर

मृत्युंजय = ऋग्वेद 7.59.12 मूल श्लोक ('ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...')। महामृत्युंजय = मूल + बीज (हौं जूं सः) + व्याहृति = तांत्रिक विस्तार, अधिक शक्तिशाली। मूल = सभी, बिना दीक्षा। बीज सहित = गुरु श्रेष्ठ। 33 अक्षर = 33 देवता। मार्कंडेय ने मृत्यु जीती।

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विस्तृत उत्तर

मृत्युंजय और महामृत्युंजय — दोनों भगवान शिव (रुद्र/त्र्यम्बक) को संबोधित हैं, परंतु रूप भिन्न:

मृत्युंजय मंत्र (मूल/लघु)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥'

यह ऋग्वेद (7.59.12) का मूल श्लोक है। ऋषि: वसिष्ठ। छंद: अनुष्टुप। इसे त्रयम्बकम मंत्र भी कहते हैं। यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता 1.8.6) में भी।

महामृत्युंजय मंत्र (बीज सहित/पूर्ण)

'ॐ हौं जूं सः

ॐ भूर्भुवः स्वः

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

ॐ स्वः भुवः भूः ॐ

सः जूं हौं ॐ'

यह मूल मंत्र + बीज मंत्र (हौं, जूं, सः) + व्याहृति (भूर्भुवः स्वः) = पूर्ण महामृत्युंजय। 'महा' = अधिक शक्तिशाली।

अंतर सार

  • मूल त्रयम्बकम् = ऋग्वेद श्लोक — सभी जप सकते हैं, बिना दीक्षा।
  • बीज सहित महामृत्युंजय = तांत्रिक विस्तार — अधिक शक्तिशाली, गुरु दीक्षा श्रेष्ठ।
  • दोनों के मूल श्लोक एक ही हैं।
  • अनेक नाम: त्रयम्बकम, रुद्र मंत्र, मृत-संजीवनी मंत्र।

33 अक्षर = 33 देवता (8 वसु + 11 रुद्र + 12 आदित्य + 1 प्रजापति + 1 षटकार)।

मार्कंडेय ऋषि: इस मंत्र से मृत्यु पर विजय प्राप्त की।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद (7.59.12), यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता 1.8.6), शिव पुराण
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