विस्तृत उत्तर
सख्य भक्ति नवधा भक्ति का आठवाँ प्रकार है। 'सख्य' का अर्थ है मित्रता — भगवान को अपना परम सखा, परम मित्र और परम हितैषी मानकर उनसे संबंध स्थापित करना।
सख्य भक्ति में भक्त और भगवान के बीच दास-स्वामी का नहीं, बल्कि मित्र-मित्र का भाव होता है। इसमें एक प्रकार की सहजता, निकटता और निर्भयता होती है। भक्त भगवान से छुपाता कुछ नहीं — अपनी सच्चाई, अपनी कमजोरियाँ, अपना प्रेम, अपनी शिकायतें — सब खुलकर कहता है।
सख्य भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण महाभारत में अर्जुन और श्रीकृष्ण का संबंध है। अर्जुन कृष्ण को 'हे कृष्ण', 'हे सखे', 'मधुसूदन' कहकर संबोधित करते हैं। वे उनसे बिना संकोच हर बात कहते हैं — युद्ध की आशंका, अपना विषाद, अपने प्रश्न सब। कृष्ण भी अर्जुन को प्रिय सखा कहते हैं।
वृंदावन में श्रीकृष्ण के सखा बालकों का भाव — सुदामा, श्रीदामा, मधुमंगल — भी सख्य भक्ति का ही स्वरूप है। इन सखाओं में भगवान के प्रति न भय था, न अत्यधिक औपचारिकता — बस प्रेम और सहजता थी।
सख्य भक्ति में भगवान पर पूर्ण विश्वास होता है — जैसे एक सच्चा मित्र अपने मित्र पर करता है। संत सुदामा का प्रसंग इसी सख्य भाव का प्रमाण है। सख्य भक्ति करने के लिए भक्त को मन से यह मानना होता है कि 'ईश्वर मेरे सबसे प्रिय और विश्वासपात्र मित्र हैं।'





