विस्तृत उत्तर
सर्प-दंश के बाद बिहुला अपने पति के शव को केले की नाव पर रखकर महीनों तक नदी में विपरीत दिशा में बहती रही, जब तक कि शव का मांस गलकर केवल अस्थियाँ (कंकाल) नहीं बचीं। वह स्वर्ग की धोबिन 'नेती धोपनी' की मदद से देवलोक पहुँची। वहाँ उसने देवताओं की सभा में भगवान शिव और पार्वती के सामने ऐसा करुण नृत्य किया कि सब रो पड़े। शिव जी के आदेश और बिहुला के वचन (कि उसका श्वसुर देवी की पूजा करेगा) पर माता मनसा ने लक्ष्मिन्दर की अस्थियों पर अमृत छिड़क कर उसे जीवित कर दिया।





