आश्विन कृष्ण पक्ष इंदिरा एकादशी व्रत कथा
१. पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का संवाद
पारंपरिक पौराणिक आख्यानों के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की यह परम कल्याणकारी और पावन कथा धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में प्रस्तुत की जाती है ।
एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने तीनों लोकों के स्वामी, कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण से अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर पूछा: "हे मधुसूदन! हे जगदीश्वर! कृपा करके मुझे यह बताइए कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? हे प्रभु, इस एकादशी के व्रत की क्या विधि है और इस परम पवित्र व्रत को करने से किस फल की प्राप्ति होती है? हे कृपानिधान, मेरे इस संशय को दूर करें और यह सम्पूर्ण विधान विस्तारपूर्वक मुझसे कहिए।"
धर्मराज युधिष्ठिर के इस प्रकार के धर्मयुक्त और श्रद्धापूर्ण प्रश्न को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत प्रसन्न होकर उत्तर दिया: "हे राजन्! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इस पावन और महान पुण्यदायिनी एकादशी का नाम 'इंदिरा एकादशी' है । हे धर्मराज! यह एकादशी समस्त पापों को समूल नष्ट करने वाली है। इस एकादशी का प्रभाव इतना अधिक है कि यदि कोई पूर्वज या पितर अपने पूर्व जन्म के कर्मों के दोष के कारण यमलोक या अधोगति (नरक) में कष्ट भोग रहे हों, तो इस व्रत के पुण्य-प्रभाव से उन्हें तत्काल नरक की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है और वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं । हे युधिष्ठिर! इस इंदिरा एकादशी की महिमा इतनी अपार है कि इस परम कल्याणकारी कथा को केवल सुनने या पढ़ने मात्र से ही मनुष्य को महान वाजपेय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त हो जाता है । अतः हे राजन्! अब तुम एकाग्रचित्त होकर इस पावन कथा का श्रवण करो।"
२. मुख्य कथा: महिष्मती नगरी और राजा इन्द्रसेन का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा: "हे राजन्! प्राचीन काल में, सतयुग के पावन समय में, महिष्मती नाम की एक अत्यंत रमणीय, विशाल और सर्व-सुख-संपन्न नगरी हुआ करती थी । उस महिष्मती नगरी में इन्द्रसेन नाम के एक महान प्रतापी, तेजस्वी और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थे ।
राजा इन्द्रसेन अत्यंत धर्मात्मा थे। उनके राज्य में प्रजा पूर्ण रूप से सुखी और निर्भय थी, क्योंकि राजा इन्द्रसेन अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान की भांति करते थे । वे राजा अपने उत्तम पुत्र, पौत्र, बंधु-बांधवों और अपार धन-धान्य से सर्वथा संपन्न थे । उनके राज्य में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं था। राजा इन्द्रसेन भगवान श्री विष्णु (श्रीहरि) के परम भक्त थे और निरंतर उनके नाम-स्मरण, भजन और धर्म-कर्म में लीन रहते थे । वे परम धार्मिक राजा सदैव ब्राह्मणों का सम्मान करते, यज्ञ-अनुष्ठान करते और बिना किसी विघ्न-बाधा के अत्यंत निष्कंटक रूप से अपना राज-काज चला रहे थे ।
३. देवर्षि नारद का राजदरबार में आगमन
एक समय की बात है, राजा इन्द्रसेन अपनी सुसज्जित राजसभा में अपने मंत्रियों, विद्वान ब्राह्मणों और सभासदों के साथ सुखपूर्वक सिंहासन पर विराजमान थे । उसी समय, आकाश मार्ग से विचरण करते हुए, भगवान श्रीहरि के अनन्य भक्त और त्रिकालदर्शी देवर्षि नारद मुनि उनकी सभा में आ पहुँचे ।
देवर्षि नारद को आकाश मार्ग से अपनी सभा में उतरते देखकर राजा इन्द्रसेन अत्यंत हर्षित हुए। राजा तत्काल अपने राजसिंहासन से उठे और अत्यंत आदरभाव से आगे बढ़कर उन्होंने देवर्षि नारद का स्वागत किया । राजा ने देवर्षि को आदरपूर्वक एक उच्च और सुंदर आसन पर बैठाया और पूर्ण शास्त्रोक्त विधिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य, गंध, धूप, दीप और सुंदर पुष्पों से उनका सत्कार एवं पूजन किया ।
सत्कार ग्रहण करने के पश्चात, देवर्षि नारद ने अत्यंत प्रसन्न होकर राजा इन्द्रसेन से पूछा: 'हे राजन्! आपके इस सुंदर राज्य में सब कुशल-मंगल तो है? आपकी प्रजा सुखपूर्वक तो है? और हे राजन्, आपकी धर्म-कर्म और भगवान विष्णु की भक्ति में मति तो दृढ़तापूर्वक स्थिर है?'
राजा इन्द्रसेन ने अत्यंत विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा: 'हे देवर्षि! आपकी अहैतुकी कृपा और आशीर्वाद से मेरे राज्य में सर्वत्र कुशल है और मेरा धर्म-कर्म भी सुचारू रूप से चल रहा है। हे मुनिश्रेष्ठ! आज आपके पावन दर्शन पाकर मेरा यह जीवन, मेरा जन्म और मेरे सभी यज्ञ-कर्म पूर्ण रूप से सफल हो गए हैं । हे देवर्षि! अब कृपा करके आप अपने यहाँ पधारने का मुख्य कारण बताइए। आपके आगमन से मैं स्वयं को अत्यंत धन्य मान रहा हूँ।'
४. पितृलोक में पिता की दुर्दशा का वर्णन एवं कारण का उद्घाटन
राजा इन्द्रसेन के इन विनम्र वचनों को सुनकर नारद मुनि ने गंभीर स्वर में कहा: 'हे राजन्! मेरी बात को अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनो। मेरे यहाँ आने का एक विशेष प्रयोजन है, जो तुम्हारे लिए महान आश्चर्य और गहरी चिंता का विषय है। हे इन्द्रसेन! मैं एक बार ब्रह्मलोक से यमराज के लोक (यमलोक) को गया था । वहाँ पहुँचकर मैंने यमराज की विशाल सभा में एक अत्यंत दुःखद दृश्य देखा। मैंने वहां तुम्हारे पिता को यमराज की सभा में उपस्थित देखा ।
तुम्हारे पिता यद्यपि अपने जीवनकाल में अत्यंत धर्मात्मा थे, परंतु पूर्व जन्म में एक बार उनसे एकादशी का व्रत भंग हो गया था। उस व्रत के नियम में त्रुटि हो जाने और उसे समय से पूर्व ही खंडित कर देने के भारी दोष के कारण, वे इस समय यमराज के लोक में निवास कर रहे हैं और भारी कष्ट भोग रहे हैं । हे राजन्! तुम्हारे पिता ने यमलोक से तुम्हारे लिए एक अत्यंत मार्मिक और करुण संदेश भेजा है ।
उन्होंने यमराज की सभा से मुझसे कहा है: "हे देवर्षि! मेरे पुत्र, महिष्मती नगरी के राजा इन्द्रसेन को मेरा यह संदेश अवश्य दीजिएगा कि मैं अपने पूर्व जन्म के एकादशी व्रत के खंडित होने के भयंकर दोष के कारण इस यमलोक की अधोगति में पड़ा हुआ हूँ और यातनाएँ सह रहा हूँ । यदि मेरा पुत्र मेरे उद्धार के लिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की 'इंदिरा एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत करे और उस व्रत का सम्पूर्ण पुण्य मुझे दान कर दे, तो मुझे इस यमलोक के भयानक कष्टों से तत्काल मुक्ति मिल जाएगी और मैं इस नर्क से छूटकर स्वर्गलोक को प्राप्त हो सकूँगा।"
देवर्षि नारद ने आगे कहा: 'हे राजन्! यद्यपि किसी भी व्यक्ति द्वारा दिया गया दान उसके परिजनों को स्वर्ग की ओर ले जा सकता है, परंतु इस विशिष्ट एकादशी व्रत का पुण्य सीधे उन्हें आध्यात्मिक लोक (वैकुंठ) में ले जाने की शक्ति रखता है । तुम्हारे पिता का यही करुण संदेश लेकर मैं सीधे तुम्हारे पास आया हूँ। अतः हे राजा इन्द्रसेन! अब तुम अपने पिता के उद्धार और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने के लिए इस इंदिरा एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा से अवश्य करो ।'"
५. देवर्षि नारद द्वारा इंदिरा एकादशी व्रत का उपदेश और विधान
नारद जी के मुख से अपने पिता की ऐसी दुर्दशा और उनके यमलोक में पड़े होने का समाचार सुनकर राजा इन्द्रसेन अत्यंत शोकाकुल और दुखी हो गए । राजा ने हाथ जोड़कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से देवर्षि नारद से प्रार्थना की: 'हे देवर्षि! कृपा करके मुझे इस इंदिरा एकादशी व्रत का सम्पूर्ण विधान, नियम और पूजा-विधि विस्तारपूर्वक बताइए, जिससे मैं अपने पिता का उद्धार कर सकूँ । इस व्रत को किस प्रकार करना चाहिए?'
देवर्षि नारद ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा: 'हे राजन्! मैं तुम्हें इस महान व्रत की उत्तम और सम्पूर्ण विधि बताता हूँ, तुम इसे अत्यंत ध्यानपूर्वक श्रवण करो और इसका अक्षरशः पालन करो :
| व्रत का दिन | नारद मुनि द्वारा उपदिष्ट व्रत-विधान एवं नियम |
|---|---|
| दशमी तिथि (व्रत से एक दिन पूर्व) | आश्विन कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करके भगवान की सेवा करनी चाहिए । फिर मध्याह्न (दोपहर) के समय किसी बहती हुई पवित्र नदी या जलाशय में जाकर पुनः स्नान करना चाहिए । स्नान के पश्चात पूर्ण श्रद्धाभाव से अपने पितरों की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण की विधि पूर्ण करनी चाहिए । इस दशमी के दिन मनुष्य को एकाग्रचित्त होकर दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए और रात्रि के समय भूमि पर शयन करना चाहिए । |
| एकादशी तिथि (मुख्य व्रत का दिन) | जब निर्मल प्रभात हो, तब एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर दातुन करके मुँह धोना चाहिए और स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाना चाहिए । इसके पश्चात भगवान के सम्मुख हाथ जोड़कर पूर्ण भक्तिभाव से व्रत के नियमों को ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा (संकल्प) करनी चाहिए । |
| मध्याह्न पूजा एवं श्राद्ध कर्म | दोपहर के समय, पवित्र शालिग्राम शिला (भगवान श्री विष्णु के विग्रह) को स्थापित करके उनके सम्मुख विधिपूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करना चाहिए तथा पवित्र अग्नि में घी की आहुति देनी चाहिए । योग्य, सदाचारी और सुपात्र ब्राह्मणों को फलाहार कराना चाहिए और उन्हें श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा देनी चाहिए । पितरों के श्राद्ध के लिए जो भोजन या पिंड बनाए गए हों, उस बचे हुए पिंड के अन्न को केवल सूँघकर गौ माता (गाय) को खिला देना चाहिए । |
| रात्रि जागरण एवं कीर्तन | एकादशी के दिन पूर्ण रूप से निराहार और भोग-विलास से दूर रहना चाहिए। धूप, दीप, गंध, नैवेद्य और पुष्पों से भगवान ऋषिकेश (श्रीहरि) का पूर्ण विधि-विधान से पूजन करना चाहिए । एकादशी की रात्रि में शयन नहीं करना चाहिए, अपितु भगवान श्री केशव की प्रतिमा के समीप बैठकर संपूर्ण रात्रि जागरण करना चाहिए । |
| द्वादशी तिथि (व्रत पारण का दिन) | अगले दिन, अर्थात् द्वादशी के प्रातःकाल सूर्योदय होने पर पुनः भगवान श्रीहरि (विष्णु) की पूर्ण भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए । तदनंतर योग्य ब्राह्मणों को आमंत्रित करके उन्हें सुस्वादु और उत्तम भोजन कराना चाहिए । ब्राह्मणों को सत्कारपूर्वक विदा करने के पश्चात, अंत में अपने भाई-बंधुओं, पुत्र-पौत्रों, नातियों और परिवार के साथ स्वयं मौन धारण करके भोजन (पारण) करना चाहिए । |
हे राजन्! एकादशी के दिन प्रातःकाल संकल्प लेते समय इस पवित्र मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
"अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः। श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥"
अर्थात् 'हे कमलनयन भगवान श्रीहरि! मैं आज एकादशी के दिन सम्पूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार रहकर एकादशी का व्रत करूँगा और कल द्वादशी के दिन भोजन ग्रहण करूँगा। हे अच्युत! मैं आपकी शरण में हूँ, आप मेरी रक्षा करें और मेरे व्रत को पूर्ण करें ।'
देवर्षि नारद ने आगे कहा: 'हे राजन् इन्द्रसेन! यदि तुम तनिक भी आलस्य किए बिना, पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ मेरे द्वारा बताई गई इस कठोर विधि से इंदिरा एकादशी का व्रत करोगे, तो तुम्हारे पिता अवश्य ही यमलोक की भयंकर यातनाओं से मुक्त होकर स्वर्गलोक (विष्णुलोक) को चले जाएँगे और उन्हें भगवान श्रीहरि के श्रीचरणों में उत्तम स्थान प्राप्त होगा ।'"
६. विधिवत व्रत-पालन एवं व्रत-फल से पिता की मुक्ति
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: "हे धर्मराज! राजा इन्द्रसेन को इस प्रकार इंदिरा एकादशी व्रत का सम्पूर्ण उपदेश देकर और व्रत की महत्ता समझाकर देवर्षि नारद वहीं अंतर्ध्यान हो गए ।
देवर्षि नारद जी के स्पष्ट उपदेश और आज्ञा के अनुसार, राजा इन्द्रसेन ने आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के आने पर उसी सम्पूर्ण विधि-विधान का अक्षरशः पालन किया । राजा ने अपने परिवार, बंधु-बांधवों, दासों और अपनी प्रजा के साथ मिलकर पूर्ण निष्ठा, भक्ति और आलस्य-रहित होकर इस निराहार व्रत का पालन किया । उन्होंने भगवान शालिग्राम की पूर्ण विधि से पूजा की, अग्नि में आहुति दी और अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक पिंड दान किया । उन्होंने पूर्ण रात्रि भगवान केशव के समीप जागरण किया ।
जैसे ही राजा इन्द्रसेन ने अगले दिन द्वादशी को अपने इस उत्तम और कठिन व्रत को पूर्ण किया और इसका सारा संचित पुण्य अपने पिता के निमित्त अर्पित किया, वैसे ही उसी क्षण एक महान अलौकिक चमत्कार हुआ । व्रत का पुण्य प्राप्त होते ही आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी । राजा इन्द्रसेन के पिता तत्काल यमराज के लोक की सभी यातनाओं और बंधनों से पूर्णतः मुक्त हो गए ।
राजा इन्द्रसेन ने स्वयं अपने नेत्रों से यह अद्भुत दृश्य देखा कि उनके पिता भगवान श्री विष्णु के दिव्य वाहन गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत तेजोमय रूप में सीधे परमधाम वैकुंठ (विष्णुलोक) की ओर प्रस्थान कर रहे हैं । पिता ने यमलोक से मुक्त होकर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक अपने धर्मनिष्ठ पुत्र को आशीर्वाद दिया और वे परम सद्गति को प्राप्त हुए ।
इंदिरा एकादशी के इस व्रत के महान पुण्य और भगवान श्रीहरि के प्रभाव से राजा इन्द्रसेन ने भी अपने जीवनकाल में निष्कंटक रूप से, सुखपूर्वक और बिना किसी सांसारिक बाधा के लंबे समय तक अपने राज्य का भोग किया । अंत समय आने पर, जब वे वृद्ध हुए, तो उन्होंने अपना राज-सिंहासन और राज्यभार अपने योग्य पुत्र को सौंप दिया। अंततः स्वयं राजा इन्द्रसेन भी इस पावन एकादशी व्रत के पुण्य-प्रताप से भगवान के परमधाम वैकुंठ लोक को प्रस्थान कर गए ।
७. पारंपरिक फल-श्रुति (व्रत-माहात्म्य)
भगवान श्रीकृष्ण ने आख्यान का समापन करते हुए कहा: "हे धर्मराज युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हारे समक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की महान पुण्यदायिनी 'इंदिरा एकादशी' के व्रत का माहात्म्य और सम्पूर्ण कथा विस्तारपूर्वक कही है ।
जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन कथा को सुनता है अथवा पढ़ता है, वह अपने जीवनकाल में इस संसार के सभी प्रकार के सुखों और उत्तम भोगों को प्राप्त करता है । इस कथा के पठन-पाठन और श्रवण मात्र से मनुष्य के पूर्व जन्म के तथा इस जन्म के सभी संचित पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
अंत समय में मृत्यु होने पर वह मनुष्य अधोगति या यमलोक को प्राप्त नहीं होता, अपितु सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर सनातन परमधाम भगवान के वैकुंठ लोक को लौट जाता है और वहां शाश्वत रूप से निवास करता है ।
अतः हे राजन्! संसार में वही मनुष्य धन्य हैं जो अपने पितरों के उद्धार और अपनी मोक्ष प्राप्ति के लिए इस परम कल्याणकारी इंदिरा एकादशी का व्रत करते हैं।"