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षोडश संस्कार📜 गृह्यसूत्र (आश्वलायन, पारस्कर), सुश्रुत संहिता, मनुस्मृति2 मिनट पठन

पुंसवन संस्कार कब करना चाहिए

संक्षिप्त उत्तर

पुंसवन = द्वितीय संस्कार। कब: गर्भ के तीसरे मास में, शुभ नक्षत्र में, गर्भ स्पन्दन से पूर्व। उद्देश्य: गर्भस्थ शिशु की रक्षा, स्वस्थ विकास। विधि: हवन + प्रजापति/विष्णु प्रार्थना + वट शाखा रस (प्रतीकात्मक) + आशीर्वाद। प्रथम गर्भ में प्रमुख। गृह्यसूत्र में विधान।

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विस्तृत उत्तर

पुंसवन संस्कार षोडश संस्कारों में द्वितीय है। यह गर्भ में शिशु के स्वस्थ विकास और रक्षा के लिए किया जाता है।

कब करें

  • गर्भ के दूसरे या तीसरे मास में (गर्भ ठहरने के बाद)।
  • अधिकांश गृह्यसूत्रों में तृतीय मास (तीसरे महीने) का विधान है।
  • शुभ नक्षत्र (पुष्य, श्रवण, हस्त आदि) में करना उत्तम।
  • गर्भ स्पन्दित होने से पहले (अर्थात् शिशु की हलचल शुरू होने से पूर्व)।

उद्देश्य

  • गर्भस्थ शिशु की रक्षा और स्वस्थ विकास।
  • गर्भपात से बचाव।
  • शारीरिक और मानसिक रूप से श्रेष्ठ सन्तान की कामना।
  • प्राचीन नाम 'पुंसवन' (पुंस = पुत्र, सवन = उत्पत्ति) है, किन्तु मूल भावना स्वस्थ सन्तान की कामना है — पुत्र या पुत्री दोनों के लिए यह शुभ है।

विधि (सरल)

  1. 1गर्भवती स्त्री स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहने।
  2. 2हवन — विशिष्ट मंत्रों से।
  3. 3वट (बरगद) वृक्ष की शाखा का रस या औषधि गर्भवती की दाहिनी नासिका में डालने का प्राचीन विधान है (आज यह प्रतीकात्मक रूप में किया जाता है)।
  4. 4प्रजापति, विष्णु, और गर्भ रक्षक देवताओं से प्रार्थना।
  5. 5गर्भवती का आशीर्वाद और मंगल कामना।

ध्यान दें: यह संस्कार सामान्यतः प्रथम गर्भ में किया जाता है। कुछ परम्पराओं में प्रत्येक गर्भ में करने का विधान है।

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शास्त्रीय स्रोत
गृह्यसूत्र (आश्वलायन, पारस्कर), सुश्रुत संहिता, मनुस्मृति
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