विस्तृत उत्तर
पुंसवन संस्कार षोडश संस्कारों में द्वितीय है। यह गर्भ में शिशु के स्वस्थ विकास और रक्षा के लिए किया जाता है।
कब करें
- ▸गर्भ के दूसरे या तीसरे मास में (गर्भ ठहरने के बाद)।
- ▸अधिकांश गृह्यसूत्रों में तृतीय मास (तीसरे महीने) का विधान है।
- ▸शुभ नक्षत्र (पुष्य, श्रवण, हस्त आदि) में करना उत्तम।
- ▸गर्भ स्पन्दित होने से पहले (अर्थात् शिशु की हलचल शुरू होने से पूर्व)।
उद्देश्य
- ▸गर्भस्थ शिशु की रक्षा और स्वस्थ विकास।
- ▸गर्भपात से बचाव।
- ▸शारीरिक और मानसिक रूप से श्रेष्ठ सन्तान की कामना।
- ▸प्राचीन नाम 'पुंसवन' (पुंस = पुत्र, सवन = उत्पत्ति) है, किन्तु मूल भावना स्वस्थ सन्तान की कामना है — पुत्र या पुत्री दोनों के लिए यह शुभ है।
विधि (सरल)
- 1गर्भवती स्त्री स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहने।
- 2हवन — विशिष्ट मंत्रों से।
- 3वट (बरगद) वृक्ष की शाखा का रस या औषधि गर्भवती की दाहिनी नासिका में डालने का प्राचीन विधान है (आज यह प्रतीकात्मक रूप में किया जाता है)।
- 4प्रजापति, विष्णु, और गर्भ रक्षक देवताओं से प्रार्थना।
- 5गर्भवती का आशीर्वाद और मंगल कामना।
ध्यान दें: यह संस्कार सामान्यतः प्रथम गर्भ में किया जाता है। कुछ परम्पराओं में प्रत्येक गर्भ में करने का विधान है।





