विस्तृत उत्तर
गर्भाधान संस्कार षोडश (16) संस्कारों में प्रथम है। यह विवाह के पश्चात् सन्तान प्राप्ति हेतु किया जाने वाला अनुष्ठान है।
कब करें
- ▸विवाह के बाद ऋतुकाल (स्त्री के मासिक चक्र के उपरान्त) में।
- ▸गृह्यसूत्रों में चतुर्थ रात्रि से सोलहवीं रात्रि तक का काल उपयुक्त बताया गया है।
- ▸सम रात्रियाँ (6ठी, 8वीं, 10वीं, 12वीं, 14वीं, 16वीं) पुत्र प्राप्ति हेतु और विषम रात्रियाँ कन्या प्राप्ति हेतु शुभ मानी गई हैं (यह परम्परागत मान्यता है, वैज्ञानिक आधार नहीं है)।
- ▸शुभ नक्षत्र और मुहूर्त देखकर करें।
कैसे करें (सरल विधि)
- 1पति-पत्नी स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें।
- 2गणेश पूजन और कलश स्थापना।
- 3हवन (अग्निहोत्र) — विशिष्ट मंत्रों से आहुतियाँ।
- 4पत्नी के गर्भ में श्रेष्ठ सन्तान की स्थापना हेतु प्रार्थना।
- 5विष्णु, प्रजापति, सिनीवाली, सरस्वती आदि देवताओं का आह्वान।
- 6पत्नी का स्पर्श करते हुए विशिष्ट मंत्र पाठ।
प्रमुख मंत्र (ऋग्वेद/गृह्यसूत्र से)
विष्णुर्योनिं कल्पयतु, त्वष्टा रूपाणि पिंशतु।
आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते॥'
आधुनिक सन्दर्भ
आज यह संस्कार प्रायः सरल पूजा-हवन के रूप में किया जाता है। कई परिवारों में यह विवाह रात्रि में ही सम्पन्न माना जाता है। मूल भावना है — ईश्वर से श्रेष्ठ, स्वस्थ और सदाचारी सन्तान की प्रार्थना।



