विस्तृत उत्तर
कर्णवेध (कान छेदना) षोडश संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इसमें बालक/बालिका के कान छेदे जाते हैं।
कब करें
- ▸सामान्यतः जन्म के तीसरे या पाँचवें वर्ष में।
- ▸कुछ परम्पराओं में 6-7 मास या 1 वर्ष में भी किया जाता है।
- ▸सम वर्ष (तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ) शुभ।
- ▸शुभ मास: माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख।
- ▸शुभ तिथि: 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 (द्वितीया, तृतीया आदि)।
महत्व
1धार्मिक
- ▸यह एक वैदिक संस्कार है जो बालक को संस्कारित और द्विज बनाने की प्रक्रिया का अंग है।
- ▸रक्षात्मक — बुरी दृष्टि और अमंगल से सुरक्षा।
- ▸अलंकार (कुण्डल) धारण — देवताओं और ऋषियों में कुण्डल धारण की परम्परा।
2आयुर्वेदिक (सुश्रुत संहिता)
सुश्रुत संहिता में कर्णवेध के चिकित्सीय लाभ बताए गए हैं:
- ▸कान छेदने से 'अभिषव' (अंडकोष वृद्धि) और 'आन्त्रवृद्धि' (हर्निया) से रक्षा।
- ▸एक्यूप्रेशर के सिद्धान्त अनुसार कान में विशिष्ट बिन्दु हैं जो मस्तिष्क विकास और स्वास्थ्य से सम्बन्धित हैं।
विधि
- 1शुभ मुहूर्त में बालक को स्नान कराएँ, नए वस्त्र पहनाएँ।
- 2गणपति पूजन, हवन।
- 3सूर्य की रोशनी में (प्रातःकाल) कान छेदना उत्तम।
- 4पहले दायाँ कान (पुत्र), पहले बायाँ कान (पुत्री) — कुछ परम्पराओं में।
- 5स्वर्ण या चाँदी की तार/कील से छेदन।
- 6घी या तेल का लेप — शीघ्र उपचार हेतु।
ध्यान दें: आज यह प्रायः सुनार या चिकित्सक द्वारा किया जाता है। स्वच्छता और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें।




