बाल कांड – पोस्ट 7: अयोध्या में राम का जन्म और बाललीला
प्रमुख घटनाक्रम
देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान विष्णु ने तय कर लिया कि वे अयोध्या के राजा दशरथ के घर अवतार लेंगे।
उधर अयोध्या में महाराज दशरथ अपनी आयु के ढलान पर थे और संतान न होने से चिंतित थे।
ऋषि वशिष्ठ के सलाह पर राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ का आयोजन किया।
यज्ञ के फलस्वरूप अग्निदेव ने हवि (खीर) देकर कहा कि इसे अपनी रानियों में बाँट दें।
उस प्रसाद को ग्रहण करने से रानियों को गर्भ धारण हुआ।
चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी को स्वयं भगवान ने राम रूप में कौसल्या के गर्भ से जन्म लिया।
साथ ही भरत (कैकेयी से), लक्ष्मण-शत्रुघ्न (सुमित्रा से) – चारों दिव्य राजकुमार प्रकट हुए।
इस पोस्ट में राम जन्म की उस पावन घड़ी का वर्णन और राम के बाल रूप की लीला (कुछ झलकियाँ) का वर्णन होगा।
राजा दशरथ का यज्ञ और प्रसाद
दशरथ ने श्रृंगी ऋषि की सहायता से भव्य यज्ञ किया।
देवताओं ने सुनिश्चित किया कि यज्ञ निर्विघ्न हो – क्योंकि यही वह समय था जिसकी सभी प्रतीक्षा कर रहे थे।
यज्ञ पुरोहित ने समिधा (हवन सामग्री) से अग्निदेव को आवाहन किया।
अग्निदेव प्रकट हुए और एक स्वर्ण पात्र में दिव्य खीर देकर बोले कि “इसे अपनी रानियों को खिलाने से पुत्रों की प्राप्ति होगी।”
राजा ने वह खीर कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा – तीनों रानियों में बाँट दी।
भगवान की लीला से सुमित्रा ने दो बार प्रसाद पाया, इसलिए उन्हें दो पुत्र (लक्ष्मण, शत्रुघ्न) हुए।
कैकेयी को भरत और कौसल्या को स्वयं श्रीराम भगवान की प्राप्ति हुई।
प्रसाद सेवन के 12 माह बाद वह क्षण आया जिसका ब्रह्मांड को इंतजार था।
दोपहर का समय, चैत्र मास की नवमी तिथि, पुनर्वसु नक्षत्र और अभिजीत मुहूर्त – सारे शुभ योग एकत्र हो गए।
तुलसीदास जी उस समय प्रकृति की अद्भुत स्थिति का वर्णन करते हैं:
- न अधिक गर्मी न सर्दी, मंद सुगंधित पवन बह रहा है।
- वृक्ष फूलों से लदे हैं, नदियाँ अमृत समान जल बहा रही हैं।
- देवता हर्षित होकर नरसिंह के वाद्य बजा रहे हैं।
- अप्सराएँ नृत्य कर रही हैं, आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है।
अयोध्या में महारानी कौसल्या ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया – स्वयं साक्षात नारायण मानव रूप में अवतरित हुए।
राम जन्म का दिव्य छंद
छंद:
भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥
भावार्थ:
दीनों पर दया करने वाले, कृपालु श्रीराम कौसल्या के हित के लिए प्रकट हुए।
माता कौसल्या हर्ष से भर गईं; मुनियों के मन को हरने वाले, अद्भुत (दिव्य) रूप वाले बालक को देखकर वे विचारमग्न सी हो गईं (कि अहा! क्या रूप है)।
श्रीराम का दिव्य स्वरूप
श्रीरामचंद्र जी का नवजात रूप अद्भुत था –
- श्याम वर्ण शरीर,
- चारों भुजाओं में दिव्य आयुध (शंख, चक्र, गदा, पद्म),
- गले में वनमाला धारण किए हुए।
कौसल्या जी समझ गईं कि स्वयं भगवान विष्णु ने पुत्र रूप में जन्म लिया है।
उन्होंने स्तुति करके प्रार्थना की:
“हे प्रभु, चारों भुजा समेटकर मनुष्य-शिशु जैसा रूप धरें ताकि मैं आपको बालक के रूप में लाड़ प्यार कर सकूँ।”
भगवान ने “एवमस्तु” कहा और दो भुजाधारी सुंदर शिशु का रूप धारण कर लिया।
अयोध्या में आनंद की लहर
अयोध्या में आनंद की लहर दौड़ गई –
कोई उन क्षणों को भूल नहीं सकता जब दशरथ को समाचार मिला कि प्राप्तिरूपी “राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न” के रूप में चार पुत्रों का जन्म हुआ है।
अन्य पुत्रों का जन्म और उत्सव
कौसल्या के प्रसव के तुरंत बाद कैकेयी से भरत और थोड़ी ही देर में सुमित्रा से जुड़वाँ पुत्र (लक्ष्मण, शत्रुघ्न) का जन्म हुआ।
पुरोहितों ने शुभ समाचार नगर में फैलाया। “अयोध्या में उत्सव जैसा न पहले कभी हुआ न होगा।”
राजा दशरथ ने अपार दान दिए, बंदीजन शुभगान करने लगे। चारों रानियों का महल मंगलध्वनि से गूंज उठा।
विशेषकर कौसल्या माता के कक्ष में तो देवता भी बालक राम के दर्शन को उत्सुक थे।
तुलसीदास जी लिखते हैं कि उस समय का आनंद शब्दों में वर्णन करना कठिन है। उन्होंने बस इतना संकेत दिया:
दोहा:
जगनिवास प्रभु प्रगटे, अखिल लोक बिश्राम।
भावार्थ:
समस्त लोकों को विश्राम देने वाले, जगत के आधार प्रभु (श्रीराम) प्रकट हो गए।
अर्थात राम के जन्म लेते ही तीनों लोकों को मानो शांति मिल गई, धरती से पाप का भार हल्का हुआ।
राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न के नामकरण और बालकाल
जन्म के छठे दिन दशरथ ने भव्य छठी उत्सव मनाया, जिसमें सुंदर झूले सजाए गए, सोहर (जन्मगीत) गाए गए।
गुरु वशिष्ठ ने उचित समय देखकर नामकरण संस्कार किया:
- कौसल्या नंदन का नाम – राम
- कैकेयी पुत्र का नाम – भरत
- सुमित्रा के जुड़वां पुत्रों के नाम – लक्ष्मण और शत्रुघ्न
अयोध्या में चारों राजकुमारों के आगमन से खुशियां बरस रही थीं।
राम की बाललीला
रामजी बचपन में अत्यंत आकर्षक और लीला करने वाले बालक थे।
वशिष्ठ जी ने उनकी कुंडली देख बता दिया था कि राम कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि अत्यंत पुनीत चरित्र वाले महान व्यक्ति होंगे।
बालक राम का रंग साँवला था, बड़ी मोहक आँखें, और मुखमंडल पर हर समय करूणा और आनंद की आभा थी।
बालक राम रोते भी थे तो ऐसा लगता मानो सबके हृदय मोहित कर रहे हों।
चंद्रमा को पकड़ने की लीला
एक प्रसंग आता है जिसमें माँ कौसल्या आरती उतारते समय बालक राम चंद्रमा को पकड़ने की ज़िद करते हैं।
तब कौसल्या एक थाली में पानी भरकर उसमें चंद्रमा की परछाईं दिखाती हैं, और राम उसे पकड़ने की चेष्टा करते हुए खिलखिला उठते हैं।
लक्ष्मण और राम का स्नेह
लक्ष्मण जी तो सदा बालक राम के पीछे-पीछे लगे रहते – वे राम से अत्यंत स्नेह करते मानो उनके अर्द्धांग ही हों।
भरत जी भी राम के परम प्रेमी थे।
तीनों माताएँ मिलकर चारों बालकों का पालन करती थीं, पर लक्ष्मण बिना राम के न रहते और शत्रुघ्न बिना भरत के नहीं।
राम की बाललीला का महत्व
तुलसीदास जी बाललीला का बहुत संक्षिप्त वर्णन करते हैं और कहते हैं कि राम का बाल रूप भक्तों को विशेष प्रिय है।
“जो इस बालचरित को गाते-सुनते हैं, वे भवसागर से तर जाते हैं।” – ऐसा वे कहते हैं।
बाल स्वरूप राम धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ) होता है।
गुरु वशिष्ठ से उन्होंने वेद-शास्त्रों की शिक्षा अल्पकाल में ही ग्रहण कर ली।
राम अत्यंत विनम्र, मर्यादित, सुशील और सबको आनंद देने वाले राजकुमार थे।
अयोध्या की प्रजा उन पर जान छिड़कती थी।
इस प्रकार भगवान ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर बाल्यकाल की लीलाएँ कीं।
आगे चलकर वही राम १६ वर्ष की आयु में विश्वामित्र मुनि के साथ यज्ञ की रक्षा और सीता स्वयंवर के लिए जनकपुर जाएंगे।
बालकांड के आगामी भाग में विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध, अहल्या उद्धार, सीता-राम मिलन और विवाह के प्रसंग आते हैं।
अगले पोस्ट में हम विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा हेतु ले जाना और मार्ग में ताड़का राक्षसी का वध व अहल्या उद्धार जैसी घटनाओं को विस्तार से जानेंगे।
पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (अष्टम संस्करण) क्यों आए ऋषि विश्वामित्र अयोध्या? कैसे हुआ ताड़का वध, और अहल्या का उद्धार?





