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प्रेत को मुक्ति देने के लिए कौन-कौन से कर्म आवश्यक हैं?

प्रेत-मुक्ति के लिए आवश्यक कर्म — दाह-संस्कार, दशगात्र, एकादशाह श्राद्ध, षोडश श्राद्ध, सपिंडन, गोदान-शय्यादान-प्रेत घट दान, वृषोत्सर्ग और गया श्राद्ध।

संक्षिप्त उत्तर

प्रेत-मुक्ति के लिए आवश्यक कर्म — दाह-संस्कार, दशगात्र, एकादशाह श्राद्ध, षोडश श्राद्ध, सपिंडन, गोदान-शय्यादान-प्रेत घट दान, वृषोत्सर्ग और गया श्राद्ध। इन सबके संयोग से प्रेत 'परम गति' को प्राप्त होता है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में प्रेत-मुक्ति के लिए आवश्यक कर्मों की एक क्रमबद्ध सूची है।

दाह-संस्कार — सर्वप्रथम विधिपूर्वक दाह-संस्कार। यह शरीर को पंचतत्वों में विलीन करता है।

दशगात्र — दस दिनों तक प्रतिदिन पिंडदान। इससे प्रेत का यातना-शरीर बनता है।

एकादशाह — ग्यारहवें दिन का श्राद्ध। गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में कहा गया है — 'ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके सपिण्डीकरण करना चाहिए।'

षोडश श्राद्ध — सोलह प्रकार के श्राद्ध। इनका क्रमबद्ध अनुष्ठान प्रेत-मुक्ति की पूरी प्रक्रिया है।

सपिंडन श्राद्ध — एक वर्ष बाद। इसमें प्रेत को पितर-श्रेणी में मिलाया जाता है। यह प्रेत-मुक्ति का अंतिम और निर्णायक चरण है।

गोदान, शय्यादान, प्रेत घट दान — ये विशेष दान प्रेत की गति सुगम करते हैं।

वृषोत्सर्ग — गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में — 'इस प्रकार शय्यादान, नवक आदि श्राद्ध और वृषोत्सर्ग का विधान करने से प्रेत परम गति को प्राप्त होता है।'

गया श्राद्ध — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'गया श्राद्ध करने से पितर भगवान गदाधर की कृपा से परम गति प्राप्त होते हैं।'

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प्रेत को मुक्ति देने के लिए कौन-कौन से कर्म आवश्यक हैं को संदर्भ सहित समझें

प्रेत को मुक्ति देने के लिए कौन-कौन से कर्म आवश्यक हैं का सबसे सीधा सार यह है: प्रेत-मुक्ति के लिए आवश्यक कर्म — दाह-संस्कार, दशगात्र, एकादशाह श्राद्ध, षोडश श्राद्ध, सपिंडन, गोदान-शय्यादान-प्रेत घट दान, वृषोत्सर्ग और गया श्राद्ध। इन सबके संयोग से प्रेत 'परम गति' को...

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