विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत-मुक्ति के लिए आवश्यक कर्मों की एक क्रमबद्ध सूची है।
दाह-संस्कार — सर्वप्रथम विधिपूर्वक दाह-संस्कार। यह शरीर को पंचतत्वों में विलीन करता है।
दशगात्र — दस दिनों तक प्रतिदिन पिंडदान। इससे प्रेत का यातना-शरीर बनता है।
एकादशाह — ग्यारहवें दिन का श्राद्ध। गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में कहा गया है — 'ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके सपिण्डीकरण करना चाहिए।'
षोडश श्राद्ध — सोलह प्रकार के श्राद्ध। इनका क्रमबद्ध अनुष्ठान प्रेत-मुक्ति की पूरी प्रक्रिया है।
सपिंडन श्राद्ध — एक वर्ष बाद। इसमें प्रेत को पितर-श्रेणी में मिलाया जाता है। यह प्रेत-मुक्ति का अंतिम और निर्णायक चरण है।
गोदान, शय्यादान, प्रेत घट दान — ये विशेष दान प्रेत की गति सुगम करते हैं।
वृषोत्सर्ग — गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में — 'इस प्रकार शय्यादान, नवक आदि श्राद्ध और वृषोत्सर्ग का विधान करने से प्रेत परम गति को प्राप्त होता है।'
गया श्राद्ध — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'गया श्राद्ध करने से पितर भगवान गदाधर की कृपा से परम गति प्राप्त होते हैं।'





