विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण का नवाँ अध्याय विशेष रूप से 'मरणासन्न व्यक्तियों के निमित्त किये जाने वाले कृत्यों' को समर्पित है। इस अध्याय में गरुड़ के प्रश्न पर भगवान विष्णु वह सम्पूर्ण विधान बताते हैं जिससे मरने वाले व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होती है।
पहला कार्य यह है कि जब प्राणी अपना शरीर छोड़ने के निकट हो, तब तुलसी के पास गोबर से एक मण्डल बनाएँ। उस मण्डल पर तिल बिखेरकर कुश बिछाएँ, और उस पर श्वेत वस्त्र के आसन पर शालिग्राम शिला स्थापित करें। भगवान विष्णु कहते हैं कि जहाँ पाप, दोष और भय को हरण करने वाली शालिग्राम-शिला विद्यमान हो, उसके समीप मरने से मुक्ति सुनिश्चित है।
मरणासन्न व्यक्ति को चौकी या आकाश में नहीं, बल्कि भूमि पर रखना चाहिए। गोबर से लीपी और कुश बिछाकर शुद्ध की गई भूमि पर रखना उत्तम है। अंतरिक्ष (ऊँचाई) पर रखने से राक्षस, पिशाच और यमदूत प्रवेश कर सकते हैं।
मरणासन्न व्यक्ति के मुख में तुलसी की मंजरी, तिल और शालिग्राम का चरणामृत देना चाहिए। पुराण में वर्णन है कि तुलसी की मंजरी के साथ प्राण त्यागने वाला, सैकड़ों पापों से युक्त हो तो भी यमराज उसे देख नहीं सकते। तुलसी के दल को मुख में रखकर तिल और कुश के आसन पर मरने वाला व्यक्ति पुत्रहीन हो तो भी निश्चित रूप से विष्णुपुर को जाता है।
इसके साथ ही मरणासन्न व्यक्ति के पास नारायण के नाम का कीर्तन होना चाहिए। भगवान विष्णु के दशावतारों के नाम — मत्स्य, कूर्म, वराह आदि — का उच्चारण उस समय अत्यंत लाभकारी है। मरते समय 'नारायण' नाम उच्चारण करने वाले को मोक्ष मिलता है — अजामिल का उदाहरण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
संक्षेप में, तुलसी, शालिग्राम, तिल, कुश, गंगाजल और हरिनाम-कीर्तन — ये पाँच तत्त्व मरणासन्न व्यक्ति को दुर्गति से बचाने वाले हैं।





