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अंत्येष्टि एवं मृत्यु संस्कार⏱ 2 मिनट पठन

गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय में मृत्यु के तुरंत बाद कौन

गरुड़ पुराण का दसवाँ अध्याय विशेष रूप से 'मृत्यु के अनन्तर के कृत्यों' को समर्पित है।

संक्षिप्त उत्तर

गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय में बताया गया है कि मृत्यु के तुरंत बाद मुंडन, शव-स्नान, छह स्थानों पर पिंडदान, दाह संस्कार (सूर्यास्त पूर्व), गंगा में अस्थि-विसर्जन और दशगात्र-कर्म प्रारंभ करने का विधान है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण का दसवाँ अध्याय विशेष रूप से 'मृत्यु के अनन्तर के कृत्यों' को समर्पित है। इसमें शव-पिंडदान, दाह संस्कार, पंचक में दाह का निषेध और शिशु अंत्येष्टि का विस्तृत विधान है।

मृत्यु होने पर सबसे पहले पुत्र को शोक का परित्याग करके मुंडन कराना चाहिए। इसके बाद स्नान करके धुले वस्त्र पहनकर शव को जल से स्नान करावे, चन्दन अथवा गंगाजी की मिट्टी का लेप करे और मालाओं से विभूषित करे।

तत्पश्चात् मृत्यु के स्थान पर 'शव' नामक पिंड को मृतक के नाम-गोत्र से प्रदान करें। इससे भूमि और उसके अधिष्ठाता देवता प्रसन्न होते हैं। द्वार पर 'पान्थ' नामक पिंड दें जिससे भूतादि-प्रेत मृत प्राणी की सद्गति में बाधा नहीं डाल सकते। चिता पर दो पिंड दें — एक 'साधक' नाम से चिता पर और एक 'प्रेत' नाम से शव के हाथ में।

दाह संस्कार सूर्यास्त से पहले करना चाहिए — रात्रि में दाह करने से मृतक को अधोगति मिलती है। पंचक-नक्षत्रों (धनिष्ठा से रेवती तक) में दाह वर्जित है। यदि अनिवार्य हो तो कुश के पाँच पुतले बनाकर उनका भी दाह करें।

शव के विदेश में होने या न मिलने पर कुश का पुतला बनाकर उसी का दाह करें और दशगात्र-कर्म उसी दिन से आरंभ करें।

शिशुओं के लिए विशेष विधान है — सत्ताइस मास तक के बालक को भूमि में गाड़ें, गंगातट पर हो तो गंगाजी में प्रवाहित करें। उससे बड़े बच्चों का दाह संस्कार करें।

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