विस्तृत उत्तर
ईश्वर एकत्व = अद्वैत — शब्दातीत (फिर भी):
अनुभव
- 1'मैं = वो, वो = मैं': 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक) = अनुभव, शब्द नहीं।
- 2सर्वत्र ईश्वर: पत्थर/पेड़/व्यक्ति/आकाश = सब = एक = मैं = ईश्वर।
- 3अनंत प्रेम: प्रेम × ∞ — सबसे प्रेम, सबमें प्रेम, प्रेम ही प्रेम।
- 4शांति: सांसारिक शांति × ∞ — 'सब ठीक है, सब ठीक था, सब ठीक रहेगा।'
- 5आंसू: आनंद के आंसू — रोकना संभव नहीं।
- 6शब्दहीन: 'जो बोलूं = कम। जो है = बोल नहीं सकता।'
उपनिषद: 'तत् त्वम् असि' (छांदोग्य) = 'वो तू है।' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' = 'सब कुछ ब्रह्म है।'





