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पढ़िए: क्या रावण जानता था कि श्रीराम ईश्वर के अवतार हैं ! परम ब्रह्म परमात्मा हैं ?
श्रीराम

पढ़िए: क्या रावण जानता था कि श्रीराम ईश्वर के अवतार हैं ! परम ब्रह्म परमात्मा हैं ?

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शूर्पणखा और रावण का संवाद

जब लक्ष्मणजी ने शूर्पणखा की नाक और कान काटकर उसे छोड़ दिया, तो वह क्रोध और अपमान से भरी खर-दूषण के पास पहुँची। खर-दूषण ने अपनी बहन का बदला लेने के लिए प्रभु श्रीराम से युद्ध करने का निश्चय किया। लेकिन श्रीराम ने अपने पराक्रम से खर-दूषण को पराजित कर उनका वध कर दिया। इसके बाद शूर्पणखा अत्यधिक क्रोध में रावण के पास पहुँची और विलाप करते हुए अपनी दुर्दशा का वर्णन करने लगी।

करसि पान सोवसि दिन राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ि किएँ अरु पाएँ।।
संग तजहिं कुमंत्र ते राजा। मान तजहिं ज्ञान पान तज लाजा।।

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि मृत्यु तेरे सिर पर खड़ी है? नीति के बिना राज्य, धर्म के बिना धन अर्जित करने से, भगवान को समर्पण किए बिना उत्तम कर्म करने से, और विवेक उत्पन्न किए बिना विद्या पढ़ने से परिणाम में केवल हानि ही हाथ लगती है। विषयों के सुख में डूबा संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान के बिना ज्ञान, और मदिरापान से लज्जा समाप्त हो जाती है।

रावण की सभा में शूर्पणखा व्याकुल होकर रोने लगी और अपमानित महसूस करते हुए बोली कि रावण जैसे महान योद्धा और भाई के होते हुए उसकी यह दुर्दशा क्यों हुई। उसकी करुणा और गुस्से से भरी बातें रावण को उत्तेजित करने के लिए थीं।

शूर्पणखा ने क्रोध और भय से भरकर रावण से कहा कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो अपनी शक्ति और पराक्रम में सिंह के समान हैं, वन में आए हैं। उनकी वीरता और कर्मों को देखकर ऐसा लगता है कि वे समस्त राक्षस जाति का अंत कर देंगे।

शूर्पणखा ने रावण से कहा कि दोनों भाई, श्रीराम और लक्ष्मण, अद्भुत बल और प्रताप के स्वामी हैं। और उनके साथ एक अत्यंत सुंदर और तेजस्विनी स्त्री (माता सीता) भी है!

राम के छोटे भाई (लक्ष्मण) ने उसकी नाक और कान काट दिए। जब उसने यह कहा कि वह उनकी बहन है, तो वे उसका उपहास करने लगे।

शूर्पणखा ने अपनी दुर्दशा बताते हुए कहा कि उसकी सहायता के लिए खर-दूषण अपनी सेना के साथ आए थे। लेकिन श्रीराम ने अपने अद्वितीय पराक्रम से थोड़े ही समय में पूरी सेना का विनाश कर दिया और खर, दूषण व त्रिशिरा का वध कर दिया। इस समाचार को सुनकर रावण व्याकुल हो गया। उसने शूर्पणखा को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया और फिर अपने कक्ष में चला गया। वहां जाकर वह बैठकर गहन चिंतन में डूब गया।

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोर अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्ह कहँ को मारइ बिनु भगवंता।।

रावण ने अपने कक्ष में गहन चिंतन करते हुए मन-ही-मन सोचा कि इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जो उसके सेवकों को हरा सके। खर-दूषण जैसे वीर और शक्तिशाली योद्धा, जिनका बल स्वयं रावण के समान था, उनको भगवान के अलावा कोई और नहीं मार सकता है।

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।
तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजउँ भव तरऊँ।।

रावण ने सोचा कि यदि श्रीराम वास्तव में भगवान का अवतार हैं, जो देवताओं को सुख और पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने के लिए आए हैं, तो वह जानबूझकर उनसे शत्रुता करेगा। भगवान के बाण से मृत्यु प्राप्त कर वह इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करेगा।

होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा।।
जौं नृप रूप भूपसुत कोऊ। हरउँ नारि जिमि जीत रन दोऊ।।

रावण ने अपने अहंकार और तामसिक स्वभाव के चलते सोचा कि उसके शरीर और स्वभाव के कारण भगवान का भजन संभव नहीं है। उसने यह ठान लिया कि यदि श्रीराम और लक्ष्मण कोई साधारण राजकुमार हैं, तो वह युद्ध में उन्हें हराकर उनकी स्त्री (माता सीता) का हरण कर लेगा। इसी कारण प्रभु श्रीराम उसे मार देंगे।

इसके बाद रावण ने मारीच की सहायता से माता सीता का हरण किया। अंततः प्रभु श्रीराम ने लंका जाकर रावण को उसके कुटुंब सहित युद्ध में पराजित कर वध कर दिया।

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