विस्तृत उत्तर
शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में माया सबसे महत्वपूर्ण और गहन अवधारणा है।
माया की परिभाषा
माया वह शक्ति है जिसके कारण एक निर्गुण ब्रह्म अनेक (जगत) के रूप में दिखता है। यह न पूर्णतः सत्य (सत्) है, न पूर्णतः असत्य (असत्) — इसे 'अनिर्वचनीय' (जिसे सत् या असत् किसी में नहीं रखा जा सकता) कहा गया है।
माया के गुण (शंकराचार्य अनुसार)
- 1अनादि (Beginningless) — माया का कोई आदि (शुरुआत) नहीं — यह अनादि काल से है।
- 1अनिर्वचनीय (Indescribable) — यह न सत् है न असत्। सत् इसलिए नहीं क्योंकि ज्ञान से नष्ट हो जाती है; असत् इसलिए नहीं क्योंकि इसका अनुभव होता है।
- 1त्रिगुणात्मिका — माया सत्व, रजस और तमस तीन गुणों से युक्त है।
- 1ब्रह्म पर आश्रित — माया ब्रह्म की शक्ति है, ब्रह्म से पृथक नहीं, पर ब्रह्म माया से अप्रभावित (अस्पृष्ट) रहता है।
माया के दो रूप
- 1आवरण शक्ति — ब्रह्म के सत्य स्वरूप को ढक देती है (जैसे बादल सूर्य को ढकता है)।
- 2विक्षेप शक्ति — ब्रह्म पर जगत का भ्रम प्रक्षेपित करती है (जैसे रस्सी पर साँप दिखना)।
सरल उदाहरण
- ▸जादूगर और जादू: जादूगर (ब्रह्म) जादू (माया) से अनेक चीजें दिखाता है, पर वह स्वयं जानता है कि सब भ्रम है — वह अप्रभावित रहता है। दर्शक (जीव) भ्रमित हो जाते हैं।
- ▸सपना: सपने में एक पूरी दुनिया दिखती है, पर जागने पर सब विलीन — वह दुनिया न सत् थी न असत् — यही माया का स्वरूप है।
माया से मुक्ति
ब्रह्मज्ञान (आत्मज्ञान) से माया नष्ट होती है — जैसे प्रकाश से अंधकार, जैसे जागने पर सपना।
विवेकचूड़ामणि (शंकराचार्य): माया को 'भवबंधन का कारण' और 'अविद्या' कहा गया — इसी से संसार चक्र चलता है।





