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दर्शन📜 बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6, 4.2.4, 4.4.22, 4.5.15)2 मिनट पठन

नेति नेति का अर्थ क्या है उपनिषदों में?

संक्षिप्त उत्तर

'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) = बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6)। ब्रह्म को जानने की निषेध विधि — जो कुछ भी सीमित/नाशवान/दृश्य है, वह ब्रह्म नहीं। सब नकार दो, जो शेष बचे वही ब्रह्म। शंकराचार्य: यह शून्य नहीं, अतिरेक है।

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विस्तृत उत्तर

'नेति नेति' (न इति, न इति = यह नहीं, यह नहीं) बृहदारण्यक उपनिषद की सबसे प्रसिद्ध विधि है जो निर्गुण ब्रह्म को समझने/परिभाषित करने के लिए प्रयुक्त होती है।

स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6):

*'अथात आदेशो नेति नेति'*

— अब ब्रह्म का निर्देश — 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं)।

अर्थ और विधि

ब्रह्म (परम सत्ता) इतना विशाल, अनंत और अवर्णनीय है कि कोई भी शब्द, विशेषण या परिभाषा उसे पूर्णतः व्यक्त नहीं कर सकती। इसलिए ब्रह्म को जानने की विधि निषेध (negation) है:

  • ब्रह्म यह शरीर नहीं — नेति
  • ब्रह्म यह मन नहीं — नेति
  • ब्रह्म यह बुद्धि नहीं — नेति
  • ब्रह्म छोटा नहीं, बड़ा नहीं, प्रकाश नहीं, अंधकार नहीं...
  • जो कुछ भी सीमित, नाशवान, दृश्य है — वह ब्रह्म नहीं।
  • जब सब कुछ नकार दिया जाता है, जो शेष बचता है — वही ब्रह्म है।

शंकराचार्य की व्याख्या

नेति नेति' का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म 'कुछ नहीं' (शून्य) है। इसका अर्थ है कि ब्रह्म इतना अधिक है कि किसी भी सीमित शब्द/विचार में नहीं समा सकता। यह 'अभाव' (absence) नहीं, 'अतिरेक' (abundance beyond description) है।

उदाहरण

  • जैसे कोई पूछे 'आकाश किस रंग का है?' — हर रंग कहने पर 'नहीं' कहना पड़ेगा, क्योंकि आकाश किसी एक रंग में सीमित नहीं — वह सबसे परे है।

'नेति नेति' क्या सिखाता है

ब्रह्म = अनिर्वचनीय, अवर्णनीय, सभी सीमाओं और परिभाषाओं से परे। इसे शब्दों से नहीं, अनुभव (अपरोक्षानुभूति) से ही जाना जा सकता है।

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शास्त्रीय स्रोत
बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6, 4.2.4, 4.4.22, 4.5.15)
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