अद्वैत (शंकर): जीव = ब्रह्म, जगत मिथ्या, ज्ञान से मोक्ष। द्वैत (मध्व): जीव ≠ ब्रह्म (सदा भिन्न), जगत सत्य, भक्ति+कृपा से मोक्ष। पंच भेद नित्य। 'तत्त्वमसि' — अद्वैत: 'तू वही है', द्वैत: 'तू उसका है।'
- 1मूल सिद्धांत: *'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः'*
- 2ब्रह्म: एकमात्र सत्य, निर्गुण, निराकार।
- 3जीव: ब्रह्म ही है, अज्ञान (माया) के कारण अलग दिखता है।
- 4जगत: मिथ्या (भ्रम) — रस्सी में साँप की तरह।
- 5मोक्ष: ज्ञान से अज्ञान हटना = मोक्ष। 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव।
- 6भेद: जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं — भेद केवल भ्रम।
- 7मूल सिद्धांत: ब्रह्म, जीव और जगत — तीनों सत्य और शाश्वत, परंतु परस्पर भिन्न।
- 8ब्रह्म: सगुण, सर्वोच्च, स्वतंत्र। विष्णु (नारायण) = परम ब्रह्म।
- 9जीव: ब्रह्म पर निर्भर, पर ब्रह्म से सदा भिन्न।
- 10जगत: सत्य — मिथ्या नहीं। ब्रह्म ने रचा है।
- 11मोक्ष: ईश्वर भक्ति और कृपा से। मोक्ष में भी जीव ब्रह्म से भिन्न रहता है (सायुज्य नहीं, सामीप्य)।
- 12पंच भेद: (1) ईश्वर-जीव (2) ईश्वर-जड़ (3) जीव-जीव (4) जीव-जड़ (5) जड़-जड़ — ये पांच भेद नित्य (शाश्वत) हैं।
- 13अद्वैत: 'वह (ब्रह्म) तू है' — एकता।
- 14द्वैत: 'तू उसका (ब्रह्म का) है' — निर्भरता, भिन्नता।