विस्तृत उत्तर
ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण जो कि सबसे प्राचीन पुराणों में गिने जाते हैं ब्रह्माण्ड के भूगोल (भुवन-कोश) का विस्तृत विवरण देते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण इसे सातवाँ और अन्तिम लोक बताता है जो अनन्त और कान्तिमय (lustrous) है। इसमें सत्यलोक को आकाश-तत्व की प्रधानता वाला माना गया है जहाँ द्वैत भाव (duality) का पूर्णतः अभाव है। ब्रह्माण्ड पुराण के इस वर्णन का तात्पर्य है कि सत्यलोक में पंचतत्वों में सबसे सूक्ष्म तत्व आकाश की प्रधानता है जो सर्वव्यापकता और अद्वैत चेतना का प्रतीक है। यहाँ द्वैत भाव का अभाव होने का अर्थ है कि यहाँ के निवासियों को मैं और तुम का भेद नहीं रहता और वे परम एकता की अनुभूति में रहते हैं।
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