विस्तृत उत्तर
ज्ञान योग (ज्ञान मार्ग) आत्म-ज्ञान के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत में इसे सर्वोत्तम मार्ग बताया है।
ज्ञान मार्ग का सार
आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं — 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.10)। अविद्या (अज्ञान) के कारण जीव स्वयं को शरीर/मन/बुद्धि मान लेता है। जब यह अज्ञान दूर होता है, तो आत्मा की वास्तविकता — कि वह ब्रह्म ही है — प्रकट होती है। यही मोक्ष है।
साधन चतुष्टय (चार आवश्यक योग्यताएं) — विवेकचूड़ामणि
- 1विवेक — नित्य (शाश्वत/ब्रह्म) और अनित्य (नाशवान/संसार) का भेद जानना।
- 2वैराग्य — सांसारिक और पारलौकिक भोगों से विरक्ति।
- 3षट्सम्पत्ति (छह गुण):
- ▸शम (मन का नियंत्रण)
- ▸दम (इंद्रियों का नियंत्रण)
- ▸उपरति (सांसारिक कार्यों से निवृत्ति)
- ▸तितिक्षा (सहनशीलता)
- ▸श्रद्धा (गुरु और शास्त्र में विश्वास)
- ▸समाधान (चित्त की एकाग्रता)
- 1मुमुक्षुत्व — मोक्ष की तीव्र इच्छा।
ज्ञान प्राप्ति की त्रिविधि
- 1श्रवण — गुरु से उपनिषदों/वेदांत का श्रवण। महावाक्यों ('तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि') को सुनना।
- 2मनन — सुने हुए ज्ञान पर तर्कपूर्ण विचार। संदेहों का निवारण।
- 3निदिध्यासन — ज्ञान का गहन ध्यान। आत्मा-ब्रह्म एकत्व में स्थिति।
गीता में ज्ञान योग
- ▸गीता 4.38 — 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' — ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में कुछ भी नहीं।
- ▸गीता 4.36 — ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
कठिनाई: ज्ञान मार्ग सबसे प्रत्यक्ष परंतु सबसे कठिन मार्ग है। इसके लिए तीव्र बुद्धि, वैराग्य और योग्य गुरु आवश्यक है।





