विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद 13 दिन की अवधि हिंदू अंत्येष्टि संस्कार में अत्यंत महत्वपूर्ण है। गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार
- 1प्रेत शरीर — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर छूट जाता है, परंतु आत्मा को तुरंत नया शरीर नहीं मिलता। वह एक सूक्ष्म 'प्रेत शरीर' (अंगूठे के आकार का — 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषः') में रहती है।
- 110 दिन — पिंड दान — गरुड़ पुराण के अनुसार प्रत्येक दिन दिए जाने वाले पिंडदान से प्रेत शरीर के विभिन्न अंग बनते हैं:
- ▸प्रथम दिन — सिर
- ▸द्वितीय — कान, आंख, नाक
- ▸तृतीय — गला, कंधे, हाथ
- ▸चतुर्थ — वक्षस्थल
- ▸पंचम — उदर
- ▸षष्ठम — कमर, पीठ
- ▸सप्तम — जंघा
- ▸अष्टम — घुटने, पैर
- ▸नवम — त्वचा, रोम
- ▸दशम — तृप्ति (भूख-प्यास शांत)
- 111वां दिन (एकादशाह) — प्रेत शरीर पूर्ण होता है। विशेष श्राद्ध किया जाता है।
- 112वां दिन (सपिंडीकरण) — इस दिन प्रेत का पितरों (पूर्वजों) में विलय किया जाता है। प्रेत अब 'पितृ' बन जाता है।
- 113वां दिन (तेरहवीं/शुद्धि) — परिवार का शोक काल (सूतक) समाप्त। ब्राह्मण भोज और दान किया जाता है। आत्मा अपनी कर्मगति के अनुसार आगे बढ़ती है।
मान्यता — 13 दिन तक आत्मा
- ▸इन 13 दिनों में आत्मा अपने परिवार और घर के आसपास ही रहती है — ऐसी मान्यता है।
- ▸इसीलिए इन दिनों घर में दीपक जलाया जाता है, जल और भोजन रखा जाता है।
- ▸13 दिन बाद आत्मा यमलोक की यात्रा पर जाती है।
ध्यान दें: यह वर्णन गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प पर आधारित है। विभिन्न संप्रदायों और दार्शनिक परंपराओं में मतभेद है। अद्वैत वेदांत में आत्मा शाश्वत और अजन्मा है — प्रेत शरीर की अवधारणा मुख्यतः लोकाचार और पौराणिक वर्णन का हिस्सा है।





