विस्तृत उत्तर
वेदांत दर्शन में उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र की व्याख्या करते हुए अनेक दार्शनिक सम्प्रदाय उत्पन्न हुए, जिनमें तीन सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली हैं:
पहला — अद्वैत वेदांत, जिसके प्रतिपादक आदि शंकराचार्य (८वीं शताब्दी) थे। इसके अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, जगत मिथ्या (माया) है और जीव वास्तव में ब्रह्म से अभिन्न है। 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' — यह इसका सार है। अज्ञान के कारण जीव ब्रह्म को अलग समझता है, ज्ञान से यह भेद मिट जाता है।
दूसरा — विशिष्टाद्वैत, जिसके प्रतिपादक रामानुजाचार्य (११वीं शताब्दी) थे। इनके अनुसार ब्रह्म सत्य है, जीव और जगत भी सत्य हैं, परंतु जीव और जगत ब्रह्म के शरीर हैं — ब्रह्म इनका अंतर्यामी है। भेद और अभेद दोनों एक साथ हैं। भक्ति के द्वारा भगवान नारायण की कृपा से मोक्ष मिलता है।
तीसरा — द्वैत वेदांत, जिसके प्रतिपादक मध्वाचार्य (१२-१३वीं शताब्दी) थे। इनके अनुसार ब्रह्म (परमात्मा-विष्णु) और जीव सर्वदा भिन्न हैं। उनके बीच पाँच प्रकार का भेद है — ईश्वर-जीव, जीव-जीव, ईश्वर-जड़, जीव-जड़ और जड़-जड़। शंकराचार्य के अद्वैत का यह सबसे कड़ा विरोध करने वाला मत है।
इनके अतिरिक्त निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत और वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत भी प्रसिद्ध हैं।





